23 जनवरी को बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ने के कारण भोजशाला पर एक बार फिर विशेष सतर्कता है। हिंदू समाज के लिए यह मां सरस्वती की आराधना का पर्व है, जबकि मुस्लिम समुदाय की साप्ताहिक नमाज भी इसी दिन होती है। इसी टकराव के कारण प्रशासन, न्यायपालिका और दोनों समुदायों की निगाहें भोजशाला पर टिकी रहती हैं।
राजा भोज और ज्ञान का स्वर्णकाल
1034 ईस्वी में परमार शासक राजा भोज ने ज्ञान-विज्ञान, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से भोजशाला का निर्माण कराया। यहां मां वाग्देवी यानी देवी सरस्वती की प्रतिमा स्थापित की गई। यह स्थल नालंदा और तक्षशिला की परंपरा में एक विशाल शैक्षणिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ, जहां देश-विदेश से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे।
महाविद्वानों की तपोभूमि रही भोजशाला
भोजशाला केवल एक इमारत नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक परंपरा का केंद्र थी। यहां माघ, बाणभट्ट, कालिदास, भामह, भास्कर भट्ट, धनपाल और मान्तृगुप्त जैसे महान विद्वानों ने अध्ययन और अध्यापन किया। 1035 ईस्वी में बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गई, जिससे इस स्थल का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व और भी बढ़ गया।
271 वर्षों तक ज्ञान का केंद्र, फिर बदला इतिहास
स्थापना के बाद लगभग 271 वर्षों तक भोजशाला ज्ञान और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनी रही। लेकिन 14वीं सदी में राजनीतिक परिस्थितियां बदल गईं। 1269 ईस्वी में कमाल मौलाना धार आकर बसे और 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर आक्रमण कर इस्लामी शासन की स्थापना की। इस दौर में भोजशाला सहित कई मंदिरों और सांस्कृतिक स्थलों को नुकसान पहुंचाया गया।
खिलजी काल और विध्वंस का दौर
इतिहास के अनुसार दिलावर खां गौरी ने विजय मंदिर को नष्ट किया। बाद में 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी द्वितीय ने भोजशाला को मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयास किया। यहीं से यह स्थल धीरे-धीरे धार्मिक और राजनीतिक विवादों के केंद्र में आ गया।
मां वाग्देवी की प्रतिमा और ब्रिटिश काल
1875 में अंग्रेजी शासन के दौरान भोपाल के पॉलिटिकल एजेंट मेजर किंकेड ने भोजशाला में खुदाई करवाई। मान्यता है कि मां वाग्देवी की प्रतिमा को वहां से निकालकर ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन ले जाया गया, जहां वह आज भी सुरक्षित है। 1961 में पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने लंदन जाकर इस प्रतिमा को धार की मां वाग्देवी के रूप में प्रमाणित किया।
आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुआ विवाद
स्वतंत्रता के बाद भी भोजशाला को लेकर संघर्ष जारी रहा। 1936 से 1942 तक नमाज पढ़ने को लेकर विवाद चला। 1942 में धार रियासत के राजा ने मुस्लिम समाज को अलग स्थान पर मस्जिद के लिए जमीन दी। 1952 से हर बसंत पंचमी पर भोज उत्सव और सांस्कृतिक आयोजन शुरू हुए, लेकिन 1977 के बाद भोजशाला परिसर में पुनः नमाज की शुरुआत हुई, जिससे विवाद फिर गहराया।
भोजशाला आज: इतिहास, आस्था और भविष्य
भोजशाला आज केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की चुनौती भी है। यह स्थल भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक संतुलन—तीनों का प्रतीक बन चुका है। खिलजी आक्रमण के 700 साल बाद भी भोजशाला का प्रश्न जीवित है और समाधान की प्रतीक्षा कर रहा है।
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