रायपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित 3200 करोड़ के शराब घोटाले में बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है। पूर्व आबकारी मंत्री और कांग्रेस विधायक कवासी लखमा 378 दिन यानी करीब 1 साल 1 महीने बाद जेल से बाहर आ गए हैं। लखमा की रिहाई के साथ ही प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर उबाल आ गया है। जेल से बाहर निकलते ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कवासी लखमा का भव्य स्वागत किया। ढोल-नगाड़ों, फूल-मालाओं और नारों के साथ समर्थकों ने उन्हें संघर्ष का प्रतीक बताया। वहीं दूसरी ओर भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट से सशर्त जमानत
15 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किए गए कवासी लखमा एक साल से अधिक समय तक जेल में रहे। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राज्य से बाहर रहने, जांच एजेंसियों को पूरा सहयोग देने और गवाहों पर दबाव नहीं डालने जैसी शर्तों के साथ जमानत दी है।
बीजेपी बोली – कांग्रेस ने बनाया बलि का बकरा
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने लखमा को कांग्रेस का “बलि का बकरा” करार दिया। उन्होंने कहा कि 3200 करोड़ के घोटाले में लखमा पर 75 से 80 करोड़ रुपये लेने के आरोप हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि कांग्रेस ने अपने ही नेता को आगे कर दिया।
कांग्रेस का पलटवार – बीजेपी माफी मांगे
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने भाजपा पर साजिश का आरोप लगाते हुए कहा कि एक आदिवासी नेता को जानबूझकर निशाना बनाया गया। बैज ने कहा कि जब भाजपा के नेता खुद लखमा को बलि का बकरा मान रहे हैं, तो यह साबित करता है कि उन्हें निर्दोष होते हुए भी जेल भेजा गया। भाजपा को कवासी लखमा से माफी मांगनी चाहिए।
राजनीति पर असर
कवासी लखमा छत्तीसगढ़ के उन गिने-चुने आदिवासी नेताओं में हैं जिन्होंने लगातार 6 बार विधानसभा चुनाव जीते हैं। बस्तर संभाग में उनका मजबूत जनाधार माना जाता है। उनकी गिरफ्तारी और अब रिहाई, दोनों ही घटनाओं ने आदिवासी राजनीति को केंद्र में ला दिया है।
आगे क्या?
शराब घोटाले का मामला अब कानूनी से ज्यादा राजनीतिक रंग लेता दिख रहा है। लखमा भले ही जमानत की शर्तों के चलते राज्य से बाहर रहेंगे, लेकिन उनकी रिहाई ने प्रदेश की सियासत में नए समीकरण जरूर पैदा कर दिए हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि जेल से बाहर आकर कवासी लखमा छत्तीसगढ़ की राजनीति पर कितना असर डाल पाते हैं।
Comments (0)