भोपाल. मध्य प्रदेश में पराली जलाने की घटनाओं में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, देशभर में दर्ज कुल मामलों में लगभग 69 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले राज्य की है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक तंत्र के लिए चुनौती बन रही है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों पर भी सवाल खड़े कर रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है।
पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गहरा असर
पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वायुमंडल में सूक्ष्म कणों की मात्रा को तेजी से बढ़ा देता है, जिससे वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है। इसका सीधा असर श्वसन संबंधी बीमारियों, एलर्जी और हृदय रोगों पर पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ शहरी इलाकों में भी इसका प्रभाव महसूस किया जा रहा है, जिससे जनस्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
किसानों की मजबूरी और आर्थिक पहलू
किसानों के लिए पराली जलाना एक त्वरित और सस्ता विकल्प बनकर उभरता है। फसल कटाई के बाद खेतों को जल्दी साफ करने और अगली बुवाई की तैयारी के लिए उनके पास सीमित समय होता है। मशीनरी और वैकल्पिक उपायों की लागत अधिक होने के कारण छोटे और सीमांत किसान इस दिशा में कदम नहीं उठा पाते, जिससे वे मजबूरी में पराली जलाने का सहारा लेते हैं।
सरकारी प्रयास और चुनौतिया
राज्य सरकार और प्रशासन द्वारा पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए विभिन्न योजनाएं और जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। मशीनरी पर सब्सिडी, जुर्माना और निगरानी तंत्र जैसे उपाय लागू किए गए हैं, लेकिन इनका प्रभाव अभी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाया है। कई क्षेत्रों में निगरानी की कमी और नियमों के पालन में ढिलाई भी सामने आई है।
समाधान की दिशा में जरूरी कदम
इस समस्या के समाधान के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। किसानों को सस्ती और सुलभ मशीनरी उपलब्ध कराना, पराली के वैकल्पिक उपयोग जैसे बायो-सीएनजी, खाद और ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देना, तथा स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों को सुदृढ़ करना जरूरी है। साथ ही, सख्त निगरानी और प्रोत्साहन आधारित नीतियों के जरिए किसानों को सकारात्मक बदलाव के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
भविष्य की चुनौती और अवसर
पराली जलाने की बढ़ती घटनाएं जहां एक ओर पर्यावरण के लिए खतरा हैं, वहीं दूसरी ओर यह समस्या नवाचार और सतत विकास के अवसर भी प्रदान करती है। यदि सरकार, वैज्ञानिक समुदाय और किसान मिलकर समन्वित प्रयास करें, तो इस चुनौती को एक स्थायी समाधान में बदला जा सकता है।