नई दिल्ली. भारतीय वायुसेना की औपचारिक स्थापना 8 अक्टूबर 1932 को हुई और 1 अप्रैल 1933 को उसकी पहली परिचालन उड़ान ने एक ऐसी यात्रा का आरंभ किया जो आगे चलकर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में शामिल होने वाली थी। प्रारंभिक दौर में उसके पास सीमित संसाधन थे कुछ अधिकारी वायु सैनिक और कुछ वेस्टलैंड वैपिटी विमान लेकिन क्षमता निर्माण की आकांक्षा स्पष्ट थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना का आकार और अनुभव दोनों तेजी से बढ़े। स्वतंत्रता के समय विभाजन के कारण संसाधनों और सैन्य इकाइयों का पुनर्विन्यास हुआ लेकिन जम्मू-कश्मीर में 1947-48 के संघर्ष ने स्वतंत्र भारत को बहुत जल्दी यह समझा दिया कि वायुशक्ति केवल युद्ध का एक अंग नहीं बल्कि दुर्गम क्षेत्रों में सैनिकों और रसद पहुंचाने हवाई सुरक्षा प्रदान करने और युद्ध की दिशा बदलने वाला निर्णायक साधन है। 1950 में गणतंत्र बनने के साथ रॉयल शब्द हटकर यह भारतीय वायुसेना बनी और अगले दशकों में स्पिटफायर टेम्पेस्ट वैम्पायर मिग-21 जगुआर मिराज-2000 सुखोई-30 एमकेआई और बाद में राफेल जैसे विभिन्न प्लेटफॉर्मों के माध्यम से उसने स्वयं को लगातार बदला।
1965 और 1971 के युद्धों में सिद्ध क्षमता
1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध भारतीय वायुसेना की परिचालन क्षमता की महत्वपूर्ण परीक्षा था। चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भारतीय वायुसेना ने वायु रक्षा इंटरसेप्शन क्लोज एयर सपोर्ट इंटरडिक्शन और शत्रु के हवाई अड्डों पर हमलों जैसे अनेक मिशनों को अंजाम दिया। सरकारी अभिलेखों के अनुसार पश्चिमी मोर्चे पर उसने लगभग 4000 सॉर्टीज उड़ाईं और लाहौर सरगोधा तथा पेशावर जैसे क्षेत्रों में पाकिस्तान की वायु क्षमताओं को चुनौती दी। हंटर मिस्टेयर और ग्नाट जैसे विमानों के साथ भारतीय पायलटों और ग्राउंड क्रू ने जिस साहस और पेशेवर दक्षता का प्रदर्शन किया उसने वायुसेना की विश्वसनीयता को मजबूत किया। 1971 का युद्ध इस विकास की अगली बड़ी सीढ़ी था। पूर्वी पाकिस्तान में वायु वर्चस्व स्थापित करने जमीनी सेनाओं को प्रभावी सहायता देने और ढाका की ओर तेजी से बढ़ते सैन्य अभियान में वायुशक्ति ने निर्णायक भूमिका निभाई। यह वह दौर था जब भारतीय वायुसेना ने सिद्ध किया कि आधुनिक युद्ध में केवल विमान होना पर्याप्त नहीं है प्रशिक्षित मानवबल सही रणनीति खुफिया जानकारी कमांड एवं नियंत्रण लॉजिस्टिक्स और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल मिलकर ही निर्णायक शक्ति बनाते हैं।
कारगिल बालाकोट से ऑपरेशन सिंदूर तक
कारगिल संघर्ष ने ऊंचाई वाले क्षेत्रों में वायुशक्ति की भूमिका का एक नया अध्याय लिखा। उसके बाद 1999 से आगे भारतीय वायुसेना ने नेटवर्क-केंद्रित युद्ध सटीक हथियारों हवाई चेतावनी प्रणालियों इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और लंबी दूरी की मारक क्षमता पर अधिक जोर दिया। 2019 के बालाकोट अभियान ने यह संदेश दिया कि भारतीय वायुशक्ति आवश्यकता पड़ने पर सीमा पार आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध सटीक कार्रवाई करने की क्षमता रखती है। इसके बाद 2025 का ऑपरेशन सिंदूर भारतीय वायुसेना के विकास का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव बना। आधिकारिक विवरण के अनुसार इस अभियान में भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध लक्षित कार्रवाई की और भारतीय वायुसेना ने सटीक हवाई अभियानों के साथ-साथ देश के हवाई क्षेत्र की बहुस्तरीय रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान भारतीय वायुसेना की एकीकृत वायु कमान एवं नियंत्रण प्रणाली स्वदेशी आकाश प्रणाली और अन्य वायु रक्षा संसाधनों ने नेटवर्क-केंद्रित युद्ध की उपयोगिता प्रदर्शित की। आज का युद्ध केवल लड़ाकू विमान बनाम लड़ाकू विमान नहीं है ड्रोन मिसाइल इलेक्ट्रॉनिक युद्ध अंतरिक्ष आधारित निगरानी साइबर क्षमता कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वास्तविक समय में प्राप्त सूचना युद्ध का स्वरूप निर्धारित कर रहे हैं।
मानवीय मिशनों में विश्वसनीयता
भारतीय वायुसेना की विश्वसनीयता केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रही है। संयुक्त राष्ट्र के अभियानों विदेशों में राहत एवं मानवीय मिशनों आपदा के समय सहायता तथा भारतीय नागरिकों की निकासी में उसने असाधारण भूमिका निभाई है। श्रीलंका में 1987 के ऑपरेशन पूमालाई में वायुसेना के परिवहन विमानों ने राहत सामग्री पहुंचाई और मिराज विमानों ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की। विदेशों में भारत की सैन्य पहुंच और संकट के समय त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता का एक आधुनिक उदाहरण 2023 का ऑपरेशन कावेरी है जिसमें युद्धग्रस्त सूडान से भारतीय नागरिकों की सुरक्षित निकासी के लिए भारतीय वायुसेना ने 18 सॉर्टीज संचालित कीं। विदेश मंत्रालय के अनुसार कुल 3961 भारतीयों के साथ अन्य देशों के नागरिकों को भी सुरक्षित निकाला गया। इन अभियानों ने दुनिया को यह दिखाया है कि भारतीय वायुसेना केवल हथियार चलाने वाली शक्ति नहीं बल्कि भारत की कूटनीतिक और मानवीय क्षमता का भी महत्वपूर्ण उपकरण है।
घटते स्क्वाड्रन और भविष्य की चुनौतियां
गौरवशाली इतिहास के बावजूद वर्तमान तस्वीर को केवल उपलब्धियों के चश्मे से देखना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उचित नहीं होगा। भारतीय वायुसेना की अधिकृत लड़ाकू स्क्वाड्रन संख्या 42 के आसपास निर्धारित रही है जबकि उपलब्ध विश्लेषणों के अनुसार 2025 में मिग-21 की अंतिम स्क्वाड्रनों की विदाई के बाद संख्या घटकर लगभग 29 रह गई। यह अंतर केवल आंकड़ा नहीं है दो मोर्चों वाली संभावित चुनौती के संदर्भ में इसका सीधा संबंध परिचालन गहराई रोटेशन प्रशिक्षण रखरखाव और लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में उपलब्ध कॉम्बैट मास से है। तेजस एमके-1ए की समय-सारिणी में हुए विलंब ने वायुसेना की तत्काल जरूरतों पर दबाव बढ़ाया है। चीन की पांचवीं पीढ़ी की स्टील्थ क्षमता और पाकिस्तान की आधुनिक लड़ाकू विमान क्षमता को देखते हुए भारत को स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट मानवयुक्त-मानवरहित टीमिंग स्टील्थ इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अत्याधुनिक सेंसर को समानांतर रूप से विकसित करना होगा। संख्या और तकनीक दोनों की जरूरत है। आत्मनिर्भरता पूरी होनी चाहिए ताकि किसी एक विदेशी स्रोत पर निर्भरता समाप्त हो। निर्णय प्रक्रिया में देरी की कोई गुंजाइश नहीं है क्योंकि समय भी एक हथियार है। भारतीय वायुसेना की आत्मा उसका एयर वॉरियर है जिसका जज्बा आज भी आसमान से ऊंचा है।