भारत ने वर्ष 2028-29 के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता हासिल करने की दिशा में अपना औपचारिक अभियान प्रारंभ कर दिया है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में ‘SHANTI’ अभियान का शुभारंभ करते हुए स्पष्ट किया कि भारत का उद्देश्य केवल परिषद की एक सीट प्राप्त करना नहीं है, बल्कि विश्व समुदाय के समक्ष एक ऐसी नीति प्रस्तुत करना है जो शांति, विश्वास, न्याय और समावेशी विकास पर आधारित हो। यह अभियान ऐसे समय शुरू किया गया है जब विश्व अनेक सैन्य, आर्थिक और मानवीय संकटों से गुजर रहा है तथा वैश्विक संस्थाओं की प्रभावशीलता पर भी गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।
क्या है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और क्यों है इसकी भूमिका महत्वपूर्ण
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद विश्व शांति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने वाली सबसे प्रभावशाली वैश्विक संस्था मानी जाती है। युद्ध, आतंकवाद, शांति स्थापना अभियानों, आर्थिक प्रतिबंधों तथा अंतरराष्ट्रीय संघर्षों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय इसी परिषद में लिए जाते हैं। परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं, जिनमें पांच स्थायी सदस्य विशेष अधिकार अर्थात वीटो शक्ति रखते हैं, जबकि दस अस्थायी सदस्य दो वर्ष के लिए चुने जाते हैं। अस्थायी सदस्य होने के बावजूद किसी देश को वैश्विक नीतियों पर प्रभावी ढंग से अपनी बात रखने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने तथा विभिन्न देशों के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत करने का अवसर प्राप्त होता है। यही कारण है कि भारत इस मंच पर अपनी सक्रिय उपस्थिति को अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है।
‘SHANTI’ अभियान के पीछे क्या है भारत की व्यापक सोच
‘SHANTI’ केवल एक आकर्षक नाम नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति की मूल भावना का प्रतिनिधित्व करता है। इसका पूर्ण रूप Securing Holistic Advancement through Norms, Trust and Integrity है, जिसका आशय नियमों के सम्मान, पारस्परिक विश्वास और संस्थागत ईमानदारी के माध्यम से समग्र विकास एवं वैश्विक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत का मानना है कि स्थायी शांति तभी संभव है जब विकास, सुरक्षा और न्याय एक-दूसरे के पूरक बनें। यदि विश्व में संघर्ष, अविश्वास और अस्थिरता बढ़ती है तो आर्थिक प्रगति, निवेश, मानवीय विकास और वैश्विक सहयोग भी प्रभावित होता है। यही विचार भारतीय दर्शन ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और संवाद आधारित कूटनीति से भी मेल खाता है, जिसे भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आगे बढ़ाता रहा है।
बदलते वैश्विक संकटों के बीच क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल
वर्तमान समय में विश्व एक साथ अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। यूरोप में जारी युद्ध, पश्चिम एशिया का तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते खतरे, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा और नई तकनीकों से जुड़ी चुनौतियां अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को लगातार प्रभावित कर रही हैं। इसके अतिरिक्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर हमलों, स्वचालित हथियारों और भ्रामक डिजिटल सामग्री ने वैश्विक सुरक्षा की परिभाषा को भी बदल दिया है। भारत का तर्क है कि इन जटिल चुनौतियों का समाधान किसी एक देश के प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं को अधिक प्रभावी, प्रतिनिधित्वपूर्ण और उत्तरदायी बनाना आवश्यक है। इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए ‘SHANTI’ अभियान को एक व्यापक कूटनीतिक संदेश के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
ताजिकिस्तान से मुकाबला और भारत की कूटनीतिक चुनौती
एशिया-प्रशांत समूह की अस्थायी सीट के लिए भारत का मुकाबला ताजिकिस्तान से होगा और अंतिम निर्णय संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य देशों के मतदान से होगा। यह चुनाव केवल दो देशों के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर विश्वास, कूटनीतिक स्वीकार्यता और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों की भी परीक्षा माना जा रहा है। भारत पिछले वर्षों में विकासशील देशों, अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र, प्रशांत द्वीपीय देशों और वैश्विक दक्षिण के साथ अपने संबंधों को लगातार मजबूत करता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत व्यापक समर्थन जुटाने में सफल रहता है तो यह उसकी वैश्विक स्वीकार्यता और बहुपक्षीय नेतृत्व क्षमता का महत्वपूर्ण संकेत होगा।
सुरक्षा परिषद में भारत की बढ़ती भूमिका क्यों मानी जा रही है अहम
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधारों की वकालत करता रहा है और उसका मानना है कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों को निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था, तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था, प्रमुख शांति स्थापना अभियानों में सक्रिय योगदान और वैश्विक दक्षिण की आवाज बनने के कारण भारत स्वयं को अधिक प्रभावी भूमिका के लिए स्वाभाविक दावेदार मानता है। ‘SHANTI’ अभियान इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा है, जिसके माध्यम से भारत यह संदेश देना चाहता है कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था केवल शक्ति संतुलन से नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग, समावेशिता और साझा उत्तरदायित्व से संचालित होनी चाहिए।