आज एआई केवल तकनीकी टूल नहीं रहा, बल्कि पढ़ाई, नौकरी और रिसर्च का अहम हिस्सा बन चुका है। निबंध की रूपरेखा बनाना, डेटा का विश्लेषण करना, कवर लेटर सुधारना या जटिल सवालों के त्वरित उत्तर पाना—ये सभी काम अब कुछ सेकंड में संभव हैं। लेकिन विशेषज्ञों की चिंता यह है कि जब हम सोचने, विश्लेषण करने और निर्णय लेने का काम लगातार एआई को सौंपते हैं, तो हमारा मस्तिष्क कम मेहनत करने लगता है।
एमआईटी स्टडी और मस्तिष्क गतिविधि का खुलासा
इस साल मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की एक महत्वपूर्ण स्टडी ने इस बहस को और गहरा कर दिया। अध्ययन में पाया गया कि जिन प्रतिभागियों ने निबंध लिखने के लिए चैटजीपीटी का उपयोग किया, उनके मस्तिष्क में कॉग्निटिव नेटवर्क की गतिविधि कम दर्ज की गई। इलेक्ट्रोएन्सेफैलोग्राफी के ज़रिये की गई इस जांच में संकेत मिला कि सीखने की प्रक्रिया के दौरान दिमाग़ अपेक्षाकृत कम सक्रिय था, जिसे शोधकर्ताओं ने संभावित सीखने की क्षमता में गिरावट से जोड़ा।
समस्या सुलझाने की क्षमता पर असर
कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी और माइक्रोसॉफ्ट की संयुक्त स्टडी ने यह दिखाया कि एआई पर बढ़ता भरोसा सीधे तौर पर क्रिटिकल थिंकिंग को प्रभावित कर सकता है। 319 पेशेवर कर्मचारियों पर आधारित इस शोध में पाया गया कि जिन लोगों ने एआई की क्षमताओं पर ज़्यादा भरोसा किया, उन्होंने समस्याओं को हल करने में अपनी स्वतंत्र सोच का कम इस्तेमाल किया। शोध के अनुसार, दक्षता बढ़ने के बावजूद गहरी सोच और तर्क क्षमता कमजोर पड़ने का खतरा बना रहता है।
छात्रों पर प्रभाव और शिक्षा की चुनौती
ब्रिटेन में स्कूली छात्रों पर किए गए एक अध्ययन में सामने आया कि हर दस में से छह छात्रों को लगता है कि एआई ने उनकी शैक्षणिक क्षमताओं पर नकारात्मक असर डाला है। हालांकि, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की विशेषज्ञ डॉ. एलेक्ज़ेंड्रा टोमेस्कू मानती हैं कि तस्वीर एकतरफा नहीं है। उनके अनुसार, अधिकांश छात्रों ने यह भी स्वीकार किया कि एआई ने उनकी समस्या सुलझाने की क्षमता, रचनात्मकता और रिवीजन में मदद की है। असल सवाल यह है कि सुविधा और सीखने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
कॉग्निटिव एट्रॉफी का बढ़ता खतरा
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रोफ़ेसर वेन होम्स “कॉग्निटिव एट्रॉफी” की अवधारणा की ओर इशारा करते हैं, जिसमें लंबे समय तक एआई पर निर्भर रहने से इंसानी कौशल धीरे-धीरे कमजोर हो सकते हैं। रेडियोलॉजिस्ट्स और मेडिकल प्रोफेशनल्स पर हुई स्टडीज़ में देखा गया कि एआई से कुछ का प्रदर्शन बेहतर हुआ, लेकिन कुछ मामलों में क्षमताएं घट भी गईं। यह दर्शाता है कि इंसान और एआई के बीच तालमेल को समझना अभी बाकी है।
आगे का रास्ता: सहयोग या निर्भरता?
एआई न तो पूरी तरह से खतरा है और न ही हर समस्या का समाधान। असली चुनौती इसके उपयोग के तरीके में है। यदि एआई को सहायक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जाए, जो सोच को दिशा दे, न कि उसकी जगह ले, तो यह इंसानी क्षमताओं को और मज़बूत कर सकता है। लेकिन अगर यह सोचने की प्रक्रिया का विकल्प बन गया, तो सीखने की गहराई और बुनियादी कौशल पर असर पड़ना तय है। आने वाले समय में व्यापक और स्वतंत्र शोध ही यह तय करेंगे कि एआई हमारे दिमाग़ का साथी बनेगा या उसकी कमजोरी।
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