भारतीय अर्थव्यवस्था की कुल GDP जहाँ लगभग 370 लाख करोड़ रुपये आँकी जाती है, वहीं घरेलू सोने की कीमत 450 लाख करोड़ रुपये के पार पहुँच चुकी है। यह सोना न तो शेयर बाज़ार में लगा है और न ही उद्योगों में निवेशित—बल्कि भारतीय घरों की तिजोरियों, लॉकरों और गहनों के रूप में चुपचाप जमा है। यही वजह है कि इसे भारत की सबसे बड़ी “छिपी हुई संपत्ति” कहा जा रहा है।
रिपोर्ट बताती है—सोना है भारत की छिपी आर्थिक शक्ति
Morgan Stanley की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय परिवारों के पास लगभग 34,600 टन सोना है। कीमतों के वर्तमान स्तर को देखें तो इसकी वैल्यू लगभग 5 ट्रिलियन डॉलर बैठती है। भारत में प्रति 10 ग्राम सोने की कीमत 1.38 लाख रुपये के आसपास पहुँच चुकी है, जबकि वैश्विक बाजार में सोना 4,500 डॉलर प्रति औंस के पार है। दिलचस्प बात यह है कि इस सोने का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा ज्वेलरी के रूप में रखा जाता है।
इतना सोना आखिर आया कहाँ से? परंपरा ही बनी है ताकत
भारत में सोना सिर्फ धातु नहीं—यह भरोसे की मुद्रा, विरासत और सामाजिक सम्मान का प्रतीक है। शादियों, त्यौहारों और निवेश के रूप में सोना सदियों से भारतीय जीवन का हिस्सा रहा है। लोगों का मानना है कि संकट के समय बैंक नहीं, बल्कि सोना साथ देता है। इसलिए कीमतें रिकॉर्ड पर होने के बावजूद भारतीय सोना बेचने के बजाय उसे संभालकर रखना पसंद करते हैं।
‘Wealth Effect’—दौलत बढ़ती है पर अर्थव्यवस्था पर असर सीमित
सोने की कीमत बढ़ने से लोगों की कुल संपत्ति कागजों पर बढ़ जाती है, जिससे उपभोक्ता भरोसा मजबूत होता है। इसे आर्थिक भाषा में ‘Wealth Effect’ कहा जाता है। लेकिन इस संपत्ति का बड़ा हिस्सा बाजार में वापस नहीं आता, क्योंकि सोना निवेश की बजाय सुरक्षा कवच के रूप में रखा जाता है। नतीजा यह कि GDP से बड़ी यह दौलत अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष योगदान सीमित ही दे पाती है।
RBI भी सोने पर बढ़ा रहा है भरोसा
सिर्फ आम लोग ही नहीं, भारतीय रिज़र्व बैंक भी सोने को रणनीतिक संपत्ति के रूप में देख रहा है। 2024 के बाद से RBI ने लगभग 75 टन सोना अपने भंडार में जोड़ा है। अब भारत के आधिकारिक गोल्ड रिज़र्व लगभग 880 टन तक पहुँच चुके हैं और विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी करीब 14 प्रतिशत हो गई है। यह संकेत है कि वैश्विक अनिश्चितता के दौर में सोना फिर से सुरक्षित विकल्प बनता जा रहा है।
सवाल वही—यह संपत्ति देश के काम कब आएगी?
सोना भारतीय समाज की भावनात्मक और सांस्कृतिक विरासत है। लेकिन जब GDP से भी ज्यादा मूल्य का सोना घरों में बंद हो, तो यह चर्चा जरूरी हो जाती है कि क्या इसे उत्पादक अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सकता है। फिलहाल यह दौलत अधिकतर निष्क्रिय पड़ी है—और यही भारत की सबसे बड़ी आर्थिक पहेली बनी हुई है।
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