नई दिल्ली - भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बदलती वैश्विक व्यवस्था और दुनिया में तेजी से बदल रहे शक्ति संतुलन पर भारत का नजरिया सामने रखा है। म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में उन्होंने अमेरिका की विदेश नीति में आए बदलाव, चीन के बढ़ते प्रभाव और दोनों देशों के बीच तेज होती प्रतिस्पर्धा पर विस्तार से बात की। साथ ही जयशंकर ने रूस के साथ भारत के पुराने और भरोसेमंद संबंधों का भी उल्लेख किया।
अमेरिका के रुख में बड़ा बदलाव
जयशंकर ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका की भूमिका में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। उनके मुताबिक अमेरिका ने अपनी स्थिति को जिस तरह बदला है, वह उसकी अपनी पसंद का हिस्सा है और इस प्रक्रिया में वह अपेक्षाकृत अधिक ‘अकेली शक्ति’ बन गया है। विदेश मंत्री के अनुसार, दुनिया की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए अमेरिका के इस बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसे वैश्विक व्यवस्था में हो रहे बड़े पुनर्संतुलन का एक प्रमुख पहलू बताया।
चीन के बढ़ते प्रभाव का जिक्र
जयशंकर ने वैश्विक व्यवस्था में चीन के बढ़ते प्रभाव को भी महत्वपूर्ण बदलाव बताया। उन्होंने कहा कि चीन खुद को एक विशिष्ट देश के रूप में देखता है और उसकी आर्थिक एवं रणनीतिक ताकत का प्रभाव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई दे रहा है।
उन्होंने अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा को भी रेखांकित किया। जयशंकर के मुताबिक यह मुकाबला केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर दूसरे देशों और वैश्विक व्यवस्था पर भी पड़ रहा है। इस प्रतिस्पर्धा के बीच अलग-अलग देश अपने हितों के मुताबिक साझेदारियों को मजबूत करने और जोखिम कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
रूस को लेकर भारत ने रखा अपना पक्ष
म्यूनिख बैठक में जयशंकर ने रूस के साथ भारत के रिश्तों को लेकर भी स्पष्ट संदेश दिया। पश्चिमी देशों की ओर से रूस के साथ भारत के संबंधों पर सवाल उठाए जाने के बीच उन्होंने कहा कि भारत अपने रिश्तों को केवल मौजूदा परिस्थितियों के आधार पर नहीं देखता, बल्कि अपने ऐतिहासिक अनुभवों को भी महत्व देता है।
जयशंकर ने कहा कि 1950 के दशक से भारत और रूस के संबंध मजबूत रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जब भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के सामने खतरे पैदा हुए, तब रूस और तत्कालीन सोवियत संघ ने भारत का साथ दिया था।
पाकिस्तान का भी किया जिक्र
विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में पाकिस्तान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब दुनिया के एक बड़े हिस्से ने भारत के पड़ोसी सैन्य शासन का समर्थन किया था, तब रूस भारत के साथ खड़ा था। जयशंकर ने संकेत दिया कि भारत-रूस संबंधों को समझने के लिए इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखना जरूरी है। उनके मुताबिक पुराने अनुभव आज भी दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित करते हैं।
बदलती दुनिया में भारत की रणनीति
जयशंकर की बातों से यह संकेत मिलता है कि भारत बदलती वैश्विक परिस्थितियों में किसी एक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार अलग-अलग देशों के साथ संबंध बनाए रखने की नीति पर जोर दे रहा है। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, चीन का बढ़ता प्रभाव और रूस के साथ ऐतिहासिक साझेदारी—इन सभी के बीच भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।