भारतीय संसद में लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू होते ही सदन अभूतपूर्व स्थिति में पहुंच गया है। संविधान के अनुच्छेद 179(c) और लोकसभा के नियम 94(c) के तहत स्पीकर को उनके पद से हटाने का नोटिस दिया गया है। यह स्थिति स्वतः ही सदन की अध्यक्षता को प्रभावित करती है, क्योंकि प्रस्ताव विचाराधीन होते ही स्पीकर के अधिकार सीमित हो जाते हैं। मौजूदा परिस्थिति की जटिलता इसलिए बढ़ गई है कि 18वीं लोकसभा में अभी तक डिप्टी स्पीकर का चुनाव ही नहीं हुआ। ऐसे में सदन की बागडोर किसके हाथ में होगी, यह बड़ा संवैधानिक प्रश्न बन गया है।
क्यों सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते ओम बिरला?
संविधान का अनुच्छेद 96(1) स्पष्ट करता है कि जब स्पीकर के खिलाफ पद से हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो, तो वे सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते। वे सदन में उपस्थित रह सकते हैं, बहस में भाग ले सकते हैं और सामान्य मतदान कर सकते हैं, लेकिन ‘कास्टिंग वोट’ यानी बराबरी की स्थिति में निर्णायक वोट देने का अधिकार उनके पास नहीं रहता। इसका अर्थ यह है कि प्रस्ताव विचाराधीन रहते हुए ओम बिरला केवल एक सांसद के रूप में सदन में उपस्थित रहेंगे, न कि अध्यक्ष के रूप में।
डिप्टी स्पीकर की अनुपस्थिति ने बढ़ाई परेशानी
सामान्य परिस्थितियों में स्पीकर की अनुपस्थिति में डिप्टी स्पीकर तुरंत कार्यभार संभालते हैं। लेकिन चूंकि 18वीं लोकसभा में अब तक डिप्टी स्पीकर चुना ही नहीं गया है, इसलिए यह स्थिति और अधिक संवैधानिक जटिलता पैदा करती है। ऐसे में सदन को संचालित करने के लिए अन्य संवैधानिक विकल्पों पर निर्भर होना पड़ेगा, जो इस समय बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
चेयरपर्सन्स का पैनल: अस्थायी लेकिन सक्रिय विकल्प
लोकसभा के नियम 9 के तहत स्पीकर सदन के 10 सदस्यों का एक ‘पैनल ऑफ चेयरपर्सन्स’ नामित करते हैं। स्पीकर और डिप्टी स्पीकर दोनों की अनुपस्थिति में इस पैनल के सदस्य बारी-बारी से सदन की अध्यक्षता कर सकते हैं। इन सदस्यों के पास कार्यवाही चलाने, व्यवस्था बनाए रखने, सदन में बोलने की अनुमति देने और मतदान कराने जैसी सभी शक्तियां होती हैं। लेकिन अविश्वास प्रस्ताव जैसा गंभीर संवैधानिक मामला केवल पैनल के भरोसे नहीं छोड़ा जाता, क्योंकि यह अस्थायी व्यवस्था मानी जाती है।
राष्ट्रपति की नियुक्ति का संवैधानिक प्रावधान
संविधान के अनुच्छेद 95(2) में यह व्यवस्था दी गई है कि यदि स्पीकर और डिप्टी स्पीकर दोनों पद रिक्त हों या कार्य करने में असमर्थ हों, तो भारत के राष्ट्रपति लोकसभा के किसी भी सदस्य को ‘अस्थायी अध्यक्ष’ नियुक्त कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में नियुक्त सदस्य सदन की सभी कार्यवाही उसी अधिकार के साथ संचालित करेगा, जैसे एक नियमित स्पीकर करता है। यह विकल्प तब लागू होता है जब सदन को स्थायी नेतृत्व की तात्कालिक आवश्यकता हो और पैनल ऑफ चेयरपर्सन्स पर्याप्त न माना जाए।
क्या होगा आगे: संसदीय मर्यादा और राजनीति की परीक्षा
इस समय लोकसभा एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां संवैधानिक प्रक्रिया, राजनीतिक संतुलन और संसदीय परंपराओं की सबसे कठिन परीक्षा हो रही है। अविश्वास प्रस्ताव का परिणाम चाहे जो हो, लेकिन डिप्टी स्पीकर पद की अनुपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सदन का सुचारु संचालन केवल राजनीतिक इच्छा से नहीं, बल्कि संवैधानिक तत्परता से भी जुड़ा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राष्ट्रपति अस्थायी अध्यक्ष नियुक्त करते हैं या पैनल ऑफ चेयरपर्सन्स ही कार्यवाही को संचालित करेगा। यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेतक बनकर उभरी है।
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