रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य के युद्ध छोटे और सीमित नहीं, बल्कि लंबे और संसाधन-आधारित होंगे। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। अब जोर केवल महंगी और हाई-एंड मिसाइलों पर नहीं, बल्कि उनके किफायती और बड़े पैमाने पर उपलब्ध ‘मिनी मॉडल्स’ के भंडार पर है।
हाल में पिनाका रॉकेट सिस्टम के हवाई संस्करण के परीक्षण को इसी रणनीति से जोड़ा जा रहा है। इसकी सटीकता और मारक क्षमता को देखते हुए इसे ‘बेबी ब्रह्मोस’ कहा जा रहा है, क्योंकि यह ब्रह्मोस की तरह प्रभावी लेकिन तुलनात्मक रूप से किफायती विकल्प माना जा रहा है। सेना प्रमुख उपेन्द्र द्विवेदी ने हाल ही में कहा कि हाई-डेंसिटी और लंबी जंग की स्थिति में ऐसे हथियार जरूरी हैं, जो तकनीकी रूप से उन्नत होने के साथ-साथ बड़ी संख्या में उपलब्ध हों।
संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में इस रणनीति का समर्थन किया है। समिति ने सुझाव दिया कि लंबे युद्ध की स्थिति में भारत को ऐसे हथियार चाहिए, जो कम लागत में और देश के भीतर बड़े पैमाने पर बनाए जा सकें। इसी सोच के तहत रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा स्वदेशी खरीद के लिए सुरक्षित रखा गया है, ताकि विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता कम हो।
जंग से मिले सबक
- रूस-यूक्रेन युद्ध में सस्ते ड्रोन ने महंगे टैंकों को भारी नुकसान पहुंचाया।
- पश्चिम एशिया में रॉकेट हमलों को रोकने के लिए महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ।
- सीमित संसाधनों वाले समूहों ने जुगाड़ तकनीक से बड़े हमलों को नाकाम किया।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि आधुनिक युद्ध में केवल हाई-टेक हथियार नहीं, बल्कि सस्ते, स्वदेशी और बड़ी संख्या में उपलब्ध सिस्टम निर्णायक साबित हो सकते हैं।
इजराइल से ‘आयरन बीम’ की दिशा में कदम
भारत, स्वदेशी ताकत बढ़ाने के साथ-साथ इजराइल से लेजर आधारित रक्षा प्रणाली आयरन बीम हासिल करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। यह तकनीक बेहद कम लागत में रॉकेट और ड्रोन को हवा में ही नष्ट करने में सक्षम बताई जाती है। दूसरी ओर, भारत छोटे हथियारों और रॉकेट सिस्टम के वैश्विक हब के रूप में भी उभर रहा है। आर्मेनिया के बाद अब फ्रांस ने भी पिनाका रॉकेट सिस्टम में रुचि दिखाई है, जो भारत की रक्षा निर्यात नीति के लिए सकारात्मक संकेत है।
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