सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में 31 वर्षीय ऐसे व्यक्ति के लिए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है जो पिछले दस वर्षों से स्थायी वेजिटेटिव स्टेट यानी गहरे कोमा की स्थिति में है। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में मरीज की गरिमा और हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ का फैसला
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ ने दिया जिसमें Justice JB Pardiwala और Justice KV Viswanathan शामिल थे। दोनों जजों ने अलग-अलग लेकिन सहमति वाले निर्णय सुनाते हुए कहा कि मरीज के हित और मानवीय गरिमा को देखते हुए जीवनरक्षक चिकित्सा सहायता को पेलिएटिव केयर व्यवस्था में हटाया जा सकता है।
जीवनरक्षक उपचार हटाने पर अदालत की स्पष्ट राय
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी मरीज के स्वस्थ होने की कोई चिकित्सीय संभावना नहीं होती, तब लगातार चिकित्सा हस्तक्षेप के जरिए जीवन को कृत्रिम रूप से लंबा करना जरूरी नहीं है। ऐसे मामलों में मुख्य सवाल यह नहीं होता कि मरीज को मरने दिया जाए या नहीं, बल्कि यह होता है कि क्या ऐसी चिकित्सा जारी रखनी चाहिए जो केवल जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रख रही हो।
CANH को सामान्य देखभाल नहीं माना जा सकता
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि CANH यानी क्लीनिकल असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन को सामान्य देखभाल नहीं माना जा सकता। कोर्ट के अनुसार यह एक तकनीकी चिकित्सा प्रक्रिया है जिसे प्रशिक्षित चिकित्सा विशेषज्ञों की निगरानी में दिया जाता है। इसलिए प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड परिस्थिति को समझते हुए इसे हटाने का निर्णय ले सकते हैं।
भविष्य के मामलों के लिए बनाए दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक आदेश के साथ भविष्य में ऐसे मामलों को लेकर स्पष्ट प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय भी तय किए हैं। अदालत ने कहा कि मेडिकल बोर्डों की राय, परिवार की सहमति और उचित चिकित्सीय मूल्यांकन के आधार पर ही ऐसे संवेदनशील निर्णय लिए जाएंगे ताकि किसी प्रकार का दुरुपयोग न हो।
गरिमा के साथ जीवन और मृत्यु का अधिकार
अदालत ने अपने फैसले में यह भी दोहराया कि संविधान के तहत जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है। जब किसी व्यक्ति की स्थिति ऐसी हो जाए कि उसके ठीक होने की संभावना समाप्त हो जाए, तब मानवीय संवेदना और चिकित्सा नैतिकता को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाना चाहिए।
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