गुड़ी पड़वा के पावन अवसर पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को उज्जैन स्थित के शिखर पर ब्रह्म ध्वज का भव्य आरोहण किया जाएगा। यह गौरवशाली परंपरा करीब दो हजार वर्ष पूर्व उज्जयिनी के प्रतापी शासक ने प्रारंभ की थी, जो आज भी पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जा रही है।
शक्ति, साहस और विजय का प्रतीक है ब्रह्म ध्वज
पुराविद डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार ब्रह्म ध्वज शक्ति, साहस और विजय का प्रतीक माना जाता है। केसरिया रंग के इस ध्वज में दो पताकाएं होती हैं और मध्य में सूर्य का अंकन रहता है, जो चारों दिशाओं में विजय और प्रकाश का संदेश देता है। प्राचीन काल में सम्राट विक्रमादित्य स्वयं चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर ब्रह्म ध्वज का आरोहण किया करते थे।
दिग्विजय परंपरा से जुड़ी है उज्जयिनी मुद्रा
इतिहासकारों के मुताबिक सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी दिग्विजय परंपरा को चिरस्थायी बनाने के लिए विशेष मुद्राएं भी जारी करवाई थीं। इन मुद्राओं के एक भाग में भगवान शिव सूर्य दंड लिए हुए अंकित हैं, जबकि दूसरी ओर उज्जयिनी का प्रतीक चिह्न बना हुआ है। उस कालखंड में उज्जयिनी मुद्रा की विश्वसनीयता थी और उज्जैन विदेशी व्यापार का प्रमुख केंद्र माना जाता था।
इस चिह्न से पहचानी जाती थी उज्जयिनी
उज्जयिनी मुद्रा के मध्य में जोड़ (प्लस) का चिह्न और उसकी चार भुजाओं पर गोलाकार आकृतियां बनी होती थीं। इसका आशय यह था कि उज्जैन पृथ्वी के केंद्र में स्थित है और जल, वायु तथा स्थल मार्ग से अन्य देशों से जुड़ा हुआ है। व्यापार और आवागमन की दृष्टि से यह नगर उस समय अत्यंत महत्वपूर्ण था।
मुख्यमंत्री ने कराया परंपरा का पुनर्प्रवर्तन
महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के निदेशक डॉ. श्रीराम तिवारी ने बताया कि विक्रमोत्सव के दौरान चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर ब्रह्म ध्वज आरोहण की चतुर्दिक परंपरा का पुनर्प्रवर्तन द्वारा किया गया है। मुख्यमंत्री ने न केवल महाकाल मंदिर बल्कि शहर के प्रमुख शासकीय और सार्वजनिक भवनों पर भी ब्रह्म ध्वज फहराने का निर्णय लिया है।
भक्त भी करा सकते हैं शिखर पर ध्वजारोहण
महाकाल मंदिर के शिखर पर भक्तों को भी ध्वज चढ़वाने की अनुमति है। इसके लिए मंदिर कार्यालय में 1100 रुपये की शासकीय रसीद कटवानी होती है। इसके अतिरिक्त ध्वज की खरीद, ध्वज पूजा, अखाड़े की भेंट और शिखर पर ध्वज लगाने वाले कर्मचारी का मेहनताना अलग से देना होता है। कुल खर्च लगभग तीन हजार रुपये बताया गया है। श्रद्धालु मंदिर कार्यालय पहुंचकर पहले से बुकिंग भी करा सकते हैं।
आस्था और इतिहास का संगम
गुड़ी पड़वा पर होने वाला ब्रह्म ध्वज आरोहण न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह उज्जैन की प्राचीन गौरवशाली परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक चेतना का भी प्रतीक है। हर वर्ष यह आयोजन श्रद्धालुओं को इतिहास से जोड़ने और आस्था को और मजबूत करने का कार्य करता है।
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