प्रयाग के संगम तट पर एक माह रहकर लोग कल्पवास करते हैं। यह परम्परा सदियों से चली आ रही है। कभी-कभी आज की युवा पीढ़ी यह प्रश्न उठाती है कि आखिर ’कल्पवास‘ क्या है? वस्तुतः यह एक ऐसा व्रत है जो प्रयाग आदि तीर्थों के तट पर किया जाता है। यह बहुत ही कठिन व्रत है। इस व्रत में सूर्योदय से पूर्व स्नान, मात्र एक बार भोजन, पुनः मध्यान्ह तथा सायंकाल तीन बार स्नान का विधान है परन्तु अधिकांश लोग केवल सुबह, शाम स्नान करते हैं। कल्पवास के व्रत को एक माह में पूर्ण करते हैं।
कल्पवास का अलग विधान
कल्पवास का अपना एक अलग विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो कल्पवासी लगातार बारह साल तक अनवरत कल्पवास करते हैं, वह मोक्ष के भागी होते हैं कर्मकाण्ड अथवा पूजा में हर कार्य संकल्प के साथ शुरू होता है और संकल्प में “श्रीश्वेतवाराहकल्पे” का सम्बोधन किया जाता है। इस कल्प का तात्पर्य यह है कि सृष्टि के सृजन से लेकर अब तक 11 कल्प व्यतीत हो चुके हैं और बारहवां कल्प चल रहा है।
प्रयाग के संगम तट पर एक माह रहकर लोग कल्पवास करते हैं। यह परम्परा सदियों से चली आ रही है। कभी-कभी आज की युवा पीढ़ी यह प्रश्न उठाती है कि आखिर ’कल्पवास‘ क्या है?
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