ओडिशा के पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ धाम में आयोजित होने वाली विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा सनातन परंपरा के सबसे विशाल और महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है। इस पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भ्राता भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ भव्य रथों पर विराजमान होकर श्रीगुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। लाखों श्रद्धालु रथों की रस्सियां खींचकर स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं। इस दिव्य यात्रा के आरंभ से पहले एक विशेष धार्मिक परंपरा निभाई जाती है, जिसमें गजपति महाराज सोने की झाड़ू से रथ के मार्ग की सफाई करते हैं। यही अनूठी रस्म इस महापर्व की सबसे विशिष्ट पहचान मानी जाती है।
'छेरा पहरा' परंपरा का है विशेष धार्मिक महत्व
सोने की झाडू से मार्ग की सफाई करने की इस परंपरा को 'छेरा पहरा' कहा जाता है। इस रस्म के दौरान पुरी के गजपति महाराज अथवा राजपरिवार के उत्तराधिकारी राजसी वेशभूषा में भगवान के रथों के समीप पहुंचते हैं और स्वर्ण अलंकृत झाडू से रथ के चारों ओर तथा मार्ग की प्रतीकात्मक सफाई करते हैं। इस दौरान सुगंधित जल, चंदन और पुष्पों का भी प्रयोग किया जाता है। वैदिक मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और जयघोष के बीच संपन्न होने वाली यह परंपरा यह दर्शाती है कि सांसारिक सत्ता भी ईश्वर की सेवा के सामने विनम्र हो जाती है।
सोने की झाडू क्यों चुनी गई, क्या है इसका आध्यात्मिक संदेश
सनातन परंपरा में स्वर्ण को पवित्रता, तेज, दिव्यता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। भगवान के मार्ग की सफाई के लिए सोने की झाडू का प्रयोग इस बात का संकेत है कि ईश्वर के स्वागत में सर्वोच्च सम्मान अर्पित किया जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह केवल बाहरी सफाई नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि का भी प्रतीक है। भक्तों का विश्वास है कि जब भगवान के आगमन से पहले मार्ग को श्रद्धा और विनम्रता के साथ शुद्ध किया जाता है, तब वह प्रत्येक श्रद्धालु के अंतर्मन को भी पवित्र करने का संदेश देता है।
राजा स्वयं झाडू लगाकर देते हैं समानता का संदेश
इस परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि गजपति महाराज स्वयं झाडू लगाते हैं। भारतीय राजपरंपरा में जहां राजा सर्वोच्च सांसारिक सत्ता का प्रतीक माना जाता था, वहीं भगवान जगन्नाथ की सेवा में वही राजा स्वयं सेवक बन जाता है। यह परंपरा स्पष्ट करती है कि ईश्वर की दृष्टि में कोई ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा या राजा-प्रजा का भेद नहीं है। भगवान के समक्ष सभी समान हैं और वास्तविक महानता सेवा, विनम्रता तथा समर्पण में निहित है। यही कारण है कि यह रस्म सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक समानता का जीवंत उदाहरण मानी जाती है।
सेवा, समर्पण और विनम्रता का जीवंत प्रतीक है यह रस्म
धार्मिक विद्वानों के अनुसार 'छेरा पहरा' केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन दर्शन का संदेश भी है। यह मनुष्य को अहंकार त्यागकर सेवा भाव अपनाने की प्रेरणा देता है। भगवान जगन्नाथ की परंपरा सदैव लोककल्याण, करुणा और सर्वसमावेशी आस्था का प्रतीक रही है। इसी कारण रथयात्रा में शामिल होने वाले लाखों श्रद्धालु इस रस्म के दर्शन को अत्यंत शुभ मानते हैं और विश्वास करते हैं कि सेवा के इस भाव को अपनाने वाला व्यक्ति ईश्वर की विशेष कृपा का पात्र बनता है।
सदियों से जीवित है आस्था और संस्कृति की यह विरासत
पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक मूल्यों का जीवंत उत्सव है। सोने की झाडू से मार्ग की सफाई की परंपरा ने सदियों से यह संदेश जीवित रखा है कि सत्ता का सर्वोच्च शिखर भी ईश्वर की सेवा से बड़ा नहीं हो सकता। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस दिव्य परंपरा के साक्षी बनकर केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि विनम्रता, समानता और निस्वार्थ सेवा के सनातन संदेश को भी आत्मसात करते हैं।