New Delhi | नवरात्रि शुरू होते ही घरों और मंदिरों में कलश स्थापना की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। पूजा स्थल पर कलश स्थापित करने के साथ ही मिट्टी के पात्र में जौ बोने की परंपरा भी निभाई जाती है। नौ दिनों तक पूजा स्थल पर रखे ये जौ धीरे-धीरे अंकुरित होकर हरे-भरे हो जाते हैं। नवरात्रि के दौरान जौ के इन अंकुरों को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। इन्हें केवल पूजा की एक परंपरा ही नहीं, बल्कि नए जीवन, समृद्धि और अन्न के महत्व का प्रतीक भी माना जाता है।
नवरात्रि में जौ क्यों बोए जाते हैं?
धार्मिक परंपरा के अनुसार, सृष्टि की शुरुआत में सबसे पहली फसल के रूप में जौ को माना गया है। इसी वजह से जौ को पूर्ण फसल और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। पूजा-पाठ और हवन में भी जौ का इस्तेमाल किया जाता है। नवरात्रि में मां दुर्गा की स्थापना के साथ जौ बोना सृष्टि के आरंभ और नए जीवन का प्रतीक माना जाता है। जौ के बीज से कुछ ही दिनों में निकलने वाले हरे अंकुर जीवन के विकास और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माने जाते हैं।
जौ के अंकुर क्या संकेत देते हैं?
लोकप्रिय धार्मिक मान्यता के अनुसार नवरात्रि में बोए गए जौ के अंकुर आने वाले समय से जुड़े संकेत देते हैं। अगर जौ तेजी से बढ़ें और हरे-भरे दिखाई दें तो इसे घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आने का शुभ संकेत माना जाता है। वहीं, जौ का कम उगना या पीला पड़ना कुछ परंपराओं में आने वाली परेशानियों का संकेत माना जाता है। हालांकि, यह पूरी तरह धार्मिक और लोक आस्था से जुड़ी मान्यता है। जौ के अंकुर मिट्टी की गुणवत्ता, पानी की मात्रा, तापमान और वातावरण के कारण भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए अंकुरों के कम बढ़ने पर किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है।
अन्नपूर्णा स्वरूप से भी जुड़ी है यह परंपरा
नवरात्रि में मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। धार्मिक परंपरा में देवी को अन्नपूर्णा के स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। ऐसे में जौ बोना अन्न और कृषि के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक माना जाता है। इसके पीछे यह भावना रहती है कि परिवार में हमेशा अन्न, सुख और समृद्धि बनी रहे।
नवरात्रि में घर पर कैसे बोएं जौ?
जौ बोने के लिए बहुत ज्यादा सामग्री की जरूरत नहीं होती। इसे आसानी से पूजा स्थल पर तैयार किया जा सकता है।
- सबसे पहले मिट्टी का एक साफ पात्र लें।
- उसमें साफ मिट्टी भरें।
- मिट्टी के ऊपर जौ के बीज समान रूप से बिखेरें।
- इसके ऊपर हल्की मिट्टी की परत डालें।
- कलश स्थापना के साथ इसे पूजा स्थल पर रखें।
- रोजाना हल्का पानी छिड़कें।
- ध्यान रखें कि पात्र में पानी जमा न हो, वरना बीज खराब हो सकते हैं।
- नौ दिनों में जौ के छोटे-छोटे हरे अंकुर निकलने लगते हैं।
नौ दिन बाद जौ का क्या करें?
नवरात्रि के समापन पर जौ के अंकुरों को धार्मिक रूप से पवित्र माना जाता है। कई परिवारों में इन्हें प्रसाद के रूप में लोगों को बांटा जाता है। कुछ लोग जौ के अंकुरों को पूजा घर या तिजोरी में भी रखते हैं। कुछ परंपराओं में इन्हें पूजा के बाद बहते जल में प्रवाहित करने की प्रथा भी है। जौ को पवित्र माना जाता है, इसलिए इन्हें कूड़े में फेंकने से बचने की सलाह दी जाती है।
जौ की हरियाली में छिपा है प्रकृति और अन्न का संदेश
नवरात्रि में जौ बोने की परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति और अन्न के महत्व से भी जुड़ी हुई है। कुछ ही दिनों में बीज से अंकुर निकलना जीवन के विकास का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि नवरात्रि में कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा आज भी देश के कई हिस्सों में श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।