अब वह दिन दूर नहीं जब आपकी कार खुद आपको चेतावनी देगी—“रुकिए, आगे खतरा है।” अब तक जो कल्पना फिल्मों और विज्ञान कथाओं तक सीमित थी, वह भारत में हकीकत बनने जा रही है। केंद्र सरकार 2026 के अंत तक देशभर में व्हीकल-टू-व्हीकल यानी V2V कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी लागू करने की तैयारी में है। इसका मकसद सड़क सुरक्षा को एक नई ऊंचाई देना है।
बिना इंटरनेट के आपस में ‘बात’ करेंगी गाड़िया
V2V तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे चलाने के लिए मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट की जरूरत नहीं होगी। हर वाहन में एक ऑन-बोर्ड यूनिट लगाई जाएगी, जो आसपास चल रही गाड़ियों से सीधे संवाद करेगी। यह यूनिट वाहन की गति, लोकेशन और अचानक ब्रेक जैसी जानकारियां तुरंत साझा करेगी, जिससे ड्राइवर को पहले ही खतरे का संकेत मिल सके।
कोहरे और अंधे मोड़ों में बनेगी ‘तीसरी आंख’
भारत में सर्दियों के दौरान कोहरे की वजह से बड़े सड़क हादसे आम हैं। V2V तकनीक ऐसे हालात में ड्राइवर के लिए तीसरी आंख का काम करेगी। जब दृश्यता शून्य के करीब होगी, तब भी कार को आगे खड़े ट्रक, धीमी गाड़ी या अचानक रुके वाहन की जानकारी पहले से मिल जाएगी। इससे चेन-रिएक्शन एक्सीडेंट्स पर लगाम लगेगी।
नितिन गडकरी का रोड सेफ्टी विजन
केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस तकनीक को सड़क हादसों के खिलाफ बड़ा हथियार बताया है। उनके मुताबिक, V2V सिस्टम से 80 प्रतिशत तक दुर्घटनाएं कम हो सकती हैं। सरकार इस परियोजना पर करीब 5000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूरसंचार विभाग ने इसके लिए आवश्यक स्पेक्ट्रम मुफ्त देने पर सहमति जताई है। शुरुआत में यह तकनीक नई गाड़ियों में अनिवार्य होगी, बाद में पुरानी गाड़ियों में भी इसे लगाया जा सकेगा।
ADAS के साथ मिलकर बनेगा मजबूत सुरक्षा कवच
फिलहाल लग्जरी गाड़ियों में मौजूद ADAS सिस्टम कैमरा और सेंसर पर निर्भर करता है। लेकिन V2V टेक्नोलॉजी इसके साथ मिलकर सुरक्षा को और पुख्ता बनाएगी, क्योंकि इसमें वाहनों के बीच सीधा संवाद होगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसकी अनुमानित लागत प्रति वाहन पांच से सात हजार रुपये हो सकती है, जो सुरक्षा के लिहाज से एक किफायती निवेश माना जा रहा है।
सड़क सुरक्षा की दिशा में बड़ा बदलाव
V2V तकनीक केवल एक नई सुविधा नहीं, बल्कि भारत की सड़क संस्कृति में बदलाव का संकेत है। जब वाहन एक-दूसरे को पहले से खतरे की जानकारी देंगे, तो दुर्घटनाओं में कमी आएगी और ड्राइविंग ज्यादा सुरक्षित होगी। आने वाले वर्षों में यह तकनीक भारतीय सड़कों की पहचान बदल सकती है।
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