कोलकाता: लंबे समय से निर्वासन का जीवन जी रहीं बांग्लादेश की चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन एक बार फिर कोलकाता की धरती पर कदम रखने जा रही हैं। 1 अगस्त को रवींद्र सदन में आयोजित धार्मिक कट्टरपंथ विरोधी साहित्यिक सम्मेलन में वह मुख्य वक्ता के रूप में शामिल होंगी। करीब 19 वर्षों बाद उनकी यह वापसी साहित्यिक और राजनीतिक दोनों ही दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
फेसबुक पोस्ट के जरिए किया दौरे का ऐलान
तसलीमा नसरीन ने अपने आधिकारिक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से कार्यक्रम में शामिल होने की पुष्टि की। यह आयोजन सेक्युलर मिशन एंड ह्यूमन राइट्स और बांग्लादेश फ्रीडम फाइटर्स फाउंडेशन (HRBFF) की ओर से किया जा रहा है। आयोजकों का कहना है कि यह कार्यक्रम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ एक मजबूत संदेश देगा।
सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर
आयोजकों के अनुसार मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने तसलीमा नसरीन की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भरोसा दिया है। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी और वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता के भी मौजूद रहने की संभावना है। साहित्यिक कार्यक्रम के अगले दिन तसलीमा मीडिया से भी बातचीत कर सकती हैं।
2007 की हिंसा के बाद छोड़ना पड़ा था कोलकाता
तसलीमा नसरीन का कोलकाता से गहरा भावनात्मक रिश्ता रहा है, लेकिन वर्ष 2007 में उनके खिलाफ हुए उग्र विरोध प्रदर्शनों ने उन्हें शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। उस समय कई इलाकों में हिंसा, आगजनी और पुलिस के साथ झड़पें हुई थीं। हालात इतने बिगड़ गए थे कि व्यवस्था बहाल करने के लिए सेना की मदद लेनी पड़ी। इसके बाद उन्हें गुप्त रूप से कोलकाता से बाहर भेज दिया गया।
निर्वासन का लंबा सफर
महिलाओं के अधिकार और धार्मिक कट्टरता पर बेबाक लेखन के कारण तसलीमा नसरीन को वर्ष 1994 में बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। इसके बाद उन्होंने यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कई देशों में समय बिताया और बाद में स्वीडन की नागरिकता प्राप्त की। इसके बावजूद वह हमेशा बंगाल की भाषा, संस्कृति और साहित्य से अपने जुड़ाव की बात करती रही हैं।
कोलकाता को बनाया था अपना दूसरा घर
भारत सरकार से रेजिडेंस परमिट मिलने के बाद वर्ष 2004 में तसलीमा कोलकाता में रहने लगी थीं। यहां उन्होंने साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभाई और शहर को अपना दूसरा घर बताया। हालांकि उनके लेखन को लेकर लगातार विवाद भी होते रहे और कई धार्मिक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए।
'द्विखंडित' से लेकर हमलों तक, विवादों से घिरा रहा सफर
तसलीमा की आत्मकथात्मक पुस्तक 'द्विखंडित' पर पश्चिम बंगाल में प्रतिबंध लगाया गया था, जिसे बाद में अदालत ने हटा दिया। वर्ष 2006 में उनके खिलाफ सार्वजनिक रूप से इनाम की घोषणा की गई, जबकि 2007 में हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान उन पर हमला भी हुआ। इन घटनाओं ने उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।
फिर चर्चा में अभिव्यक्ति की आजादी का मुद्दा
करीब दो दशक बाद तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी को केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, महिला अधिकारों और धार्मिक कट्टरपंथ पर चल रही बहस के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बदलते राजनीतिक माहौल के बीच उनकी यह यात्रा देशभर में नई चर्चा को जन्म दे सकती है।