भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल के वर्षों में अपनी विदेशी मुद्रा प्रबंधन नीति में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी बदलाव किया है। वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव और डॉलर में उतार-चढ़ाव को देखते हुए भारत अब पारंपरिक निवेश विकल्पों से हटकर अधिक सुरक्षित और दीर्घकालिक रणनीति अपना रहा है। इसी कड़ी में RBI ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी को उल्लेखनीय रूप से घटाया है और सोने के भंडार को मजबूत किया है।
अमेरिकी बॉन्ड में निवेश घटाने का बड़ा फैसला
RBI ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में अपनी होल्डिंग को घटाकर 200 अरब डॉलर से नीचे ला दिया है। यह फैसला भारत की विदेशी निवेश रणनीति में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है। लंबे समय तक अमेरिकी बॉन्ड को सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है, लेकिन बदलते वैश्विक हालात ने इस सोच को चुनौती दी है।
एक साल में 50 अरब डॉलर से ज्यादा की कटौती
पिछले एक साल के भीतर RBI ने अमेरिकी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी 50 अरब डॉलर से अधिक कम की है। विशेषज्ञों का मानना है कि डॉलर की अस्थिरता, अमेरिका की मौद्रिक नीतियों में बदलाव और बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों ने भारत को यह कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है। इससे भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को संभावित झटकों से बचा रहा है।
डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीति
भारत धीरे-धीरे अमेरिकी डॉलर आधारित परिसंपत्तियों पर निर्भरता घटा रहा है। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार को अधिक संतुलित और सुरक्षित बनाना है। RBI अब अपनी रणनीति में विविधता ला रहा है ताकि किसी एक देश या मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता न रहे।
सोने के भंडार में लगातार बढ़ोतरी
अमेरिकी बॉन्ड से दूरी बनाते हुए RBI ने सोने के भंडार को 880 मीट्रिक टन से अधिक कर लिया है। सोना वैश्विक स्तर पर संकट के समय सबसे सुरक्षित संपत्ति माना जाता है। यही वजह है कि RBI अपनी विदेशी मुद्रा का एक बड़ा हिस्सा सोने में बदल रहा है, जिससे लंबी अवधि में आर्थिक स्थिरता बनी रहे।
आर्थिक संकट में सोना क्यों है अहम
इतिहास गवाह है कि जब भी वैश्विक बाजारों में संकट आता है, सोने की कीमत और उसकी विश्वसनीयता बढ़ जाती है। RBI का सोने पर बढ़ता भरोसा यह संकेत देता है कि भारत भविष्य के आर्थिक झटकों के लिए खुद को पहले से तैयार कर रहा है।
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अब भी मजबूत
इन सभी बदलावों के बावजूद भारत की समग्र आर्थिक स्थिति मजबूत बनी हुई है।
भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 685 अरब डॉलर के स्तर पर स्थिर है। यह भंडार आयात बिलों के भुगतान, रुपये की स्थिरता बनाए रखने और वैश्विक आर्थिक दबावों से निपटने में अहम भूमिका निभाता है।
रुपये की मजबूती के लिए अहम कदम
RBI की यह रणनीति रुपये की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को मजबूत करने में भी मदद करती है। संतुलित निवेश पोर्टफोलियो से मुद्रा पर दबाव कम होता है और देश की वित्तीय विश्वसनीयता बढ़ती है।
क्या संकेत देता है RBI का यह कदम
RBI का यह फैसला बताता है कि भारत अब केवल परंपरागत सुरक्षित निवेश पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार अपनी आर्थिक नीति को लचीला और भविष्य-सुरक्षित बना रहा है।
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