मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम आने में अब 10 दिन शेष है, लेकिन हार-जीत को लेकर दोनों प्रमुख दलों के प्रत्याशियों की नींद उड़ी हुई है। पांचवीं बार सत्ता में आने के लिए भाजपा ने जहां एढ़ी-चोंटी का जोर लगाया है, वहीं कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। हालांकि अभी परिणाम सामने नहीं आए हैं, लेकिन दोनों प्रमुख दलों में पार्टी को नुकसान पहुंचाने वालों की कुंडलियां तैयार होना शुरू हो गई है।
जिले में दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा भितरघातियों से अछूते नहीं रहे हैं। चुनाव में कई नाराज पार्टीजनों ने खुलकर संगठन विरोधी कार्य किया तो कई छिपते-छुपाते पार्टी प्रत्याशियों को कमजोर करने में जुटे रहे। भाजपा ने जहां कई विरोधियों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है, वहीं कांग्रेस में तैयारी चल रही है।
जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस से जहां दो नए चेहरे मैदान में रहे, वहीं भाजपा से एक। टिकट वितरण के बाद से दोनों ही दलों में विरोधियों की फौज बढ़ती गई। संगठन और वरिष्ठ नेताओं ने नाराज पार्टीजनों को साधने की हर संभव कोशिश की, लेकिन कई बगावती तेवर दिखाते हुए खुलकर मैदान में आ गए तो कुछ ने पार्टी में रहकर भितरघात किया।
भाजपा में खुलकर सामने आने वाले विरोधियों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और अब भितरघातियों की पड़ताल कर सूची तैयार की जा रही है। कांग्रेस में खुलकर सामने आए विरोधियों की जानकारी संगठन में उच्च स्तर पर दे दी गई है, वहीं अब भितरघातियों का पता लगाया जा रहा है।
रतलाम ग्रामीण
रतलाम ग्रामीण सीट पर कांग्रेस से लक्ष्मण सिंह डिंडोर और भाजपा से मथुरालाल डामर आमने-सामने हैं। भाजपा ने वर्तमान विधायक दिलीप मकवाना का टिकट काटकर पूर्व विधायक मथुरालाल डामर को तीसरी बार मैदान में उतारा तो कांग्रेस में डिंडोर नया चेहरा रहे। प्रत्याशियों को लेकर दोनों दलों में पार्टी जनों की नाराजगी रही।
कांग्रेस में जहां बगावती तेवर खुलकर सामने आए, वहीं भाजपा में अंदरुनी रूप से नुकसान पहुंचाने वालों की कमी नहीं रही। कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर जयस के डा. अभय ओहरी निर्दलीय रूप से मैदान में कूद गए। कांग्रेस-भाजपा से नाराज कई नेताओं, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने खुलकर व चोरी-छिपे बगावत के तेवर दिखाए।
रतलाम शहर
रतलाम शहर सीट पर भाजपा ने वर्तमान विधायक चेतन्य काश्यप को तीसरी बार मौका दिया तो कांग्रेस ने दूसरी बार पारस सकलेचा पर भरोसा जताया। दोनों दलों से कई दावेदारों के नाम ऊपर-नीचे हुए। शहर में भाजपा की गुटबाजी जगजाहिर है तो कांग्रेस में भी कम नहीं है।
भाजपा से पूर्व पार्षद अरुण राव मैदान में रहे, वहीं ज्यादातर कांग्रेसी इस बार एकजुट होकर पार्टी प्रत्याशी को जिताने में जुटे रहे। शहर सीट पर दोनों दलों को भितरघात की जानकारी मिली है। भाजपा ने मैदान में रहने वाले राव को जहां पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है, वहीं अन्य गद्दारों की सूची तैयार की जा रही है। यही स्थिति कांग्रेस में भी है।
सैलाना
आदिवासी बहुल सैलाना अजजा सीट पर भाजपा ने वर्तमान में पूर्व विधायक संगीता चारेल पर तीसरी बार भरोसा जताया तो कांग्रेस ने वर्तमान विधायक हर्ष विजय गहलोत को ही तीसरी बार मौका दिया। यहां दोनों दलों में बगावत के सुर मुखर नहीं हुए, लेकिन अंदरखाने विरोध का ज्वालामुखी फूटता रहा। इस सीट पर दोनों दलों से विरोधी खुलकर सामने नहीं आए, लेकिन संगठनों को अपने ही दल से भितरघात होने की जानकारी मिली है।
जावरा
जावरा सीट पर भाजपा ने वर्तमान विधायक डा. राजेंद्र पांडेय पर लगातार छठी बार भरोसा जताया तो कांग्रेस ने नए चेहरे के रूप में वीरेंद्रसिंह सोलंकी को मैदान में उतारा। कांग्रेस से पहले हिम्मतसिंह श्रीमाल के नाम पर मुहर लगाई गई थी, लेकिन भारी विरोध के चलते सोलंकी को सामने लाया गया। दोनों प्रत्याशियों के विरोध में कई पार्टीजन सामने आए। बागियों ने नाम वापस ले लिए, लेकिन पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में काम नहीं किया।
उधर कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर करणी सेना परिवार के जीवनसिंह शेरपुर निर्दलीय रूप से मैदान में कूद गए। दोनों दलों के ज्यादातर विरोधियों ने खुलकर निर्दलीय प्रत्याशी का समर्थन किया, वहीं कुछ अन्य विरोधी भी पार्टी प्रत्याशी को नुकसान पहुंचाने में पीछे नहीं रहे। यहां कांग्रेस व भाजपा में जमकर भितरघात की जानकारी मिली है। भाजपा ने कुछ विरोधियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है तो कुछ अन्य को बाहर करने की तैयारी चल रही है। कांग्रेस से अभी भी तक किसी के भी खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई है।
आलोट
आलोट अजा सीट पर भाजपा ने पूर्व सांसद चिंतामणि मालवीय को मैदान में उतारा, वहीं कांग्रेस ने वर्तमान विधायक मनोज चावला पर दूसरी बार भरोसा जताया। यहां कांग्रेस-भाजपा प्रत्याशियों का जमकर विरोध हुआ और बगावती तेवर दिखाते हुए विरोधियों ने नामांकन भी दाखिल कर दिया।
भाजपा में समझाइश के बाद नाम वापस ले लिया गया, लेकिन कांग्रेस से पूर्व सांसद-विधायक रहे प्रेमचंद गुड्डू निर्दलीय रूप से मैदान में डटे रहे। दोनों दलों से नाराज नेताओं, पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं ने खुलकर तो दबे-छुपे पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ काम किया। चुनाव के दौरान दोनों दलों में भितरघात की जानकारी सामने आई है।
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