छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोक कलाकार और पंडवानी गायन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के निधन हो गया। उन्होंने सुबह करीब 3:15 बजे रायपुर स्थित एम्स में अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था।
डॉ. तीजन बाई ने अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय और अनूठी प्रस्तुति शैली के माध्यम से पंडवानी गायन को देश-विदेश में नई पहचान दिलाई। महाभारत की कथाओं को मंच पर जीवंत रूप में प्रस्तुत करने की उनकी अद्भुत कला ने उन्हें भारतीय लोक संस्कृति की सबसे सम्मानित और लोकप्रिय कलाकारों में शामिल किया।
13 साल की उम्र से शुरू किया था पंडवानी गायन का सफर
डॉ. तीजन बाई ने महज 13 वर्ष की उम्र में पंडवानी गायन की शुरुआत की थी। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर लोक कला की दुनिया में अलग पहचान बनाई। उनकी प्रस्तुतियों ने देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में भारतीय लोक परंपरा का गौरव बढ़ाया।
रूढ़ियों को तोड़कर तय किया 'वैश्विक मंच' तक का सफर
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में 1956 में जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्ष और दृढ़ संकल्प की एक अद्वितीय मिसाल रहा है. उन्होंने लोक कला 'पंडवानी' (महाभारत की पारंपरिक कथा गायन शैली) को न केवल सहेजा, बल्कि उसे एक नया आयाम दिया. तीजन बाई ने उस दौर में पंडवानी की 'कापालिक शैली' को अपनाया, जिस पर पारंपरिक रूप से पुरुषों का वर्चस्व हुआ करता था. शुरुआत में उन्हें भारी सामाजिक विरोध और बंधनों का सामना करना पड़ा. लेकिन अपनी दमदार आवाज, कड़क अभिनय, बेजोड़ अभिनय कला और हाथ में तंबूरा लिए जब वे मंच पर उतरती थीं, तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे.
पद्म विभूषण समेत कई राष्ट्रीय सम्मानों से हुईं सम्मानित
पांच दशकों से अधिक के अपने शानदार करियर में उन्होंने देश ही नहीं, बल्कि एशिया और यूरोप सहित दुनिया के कई कोनों में छत्तीसगढ़ की माटी की इस कला का परचम लहराया. लोक संस्कृति और कला के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए तीजन बाई को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से विभूषित किया गया था जिनमें पद्म श्री (1987/88), पद्म भूषण (2003), पद्म विभूषण (2019), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार शामिल है.