नई दिल्ली. आज एक ऐसे गाने की चर्चा हो रही है जो समय की धूल को झाड़कर आज भी लोगों के दिलों में जगह बनाए हुए है। सन 1969 में रिलीज हुई फिल्म एक फूल दो माली का गाना औलाद वालों फूलों फलों आज भी उतना ही भावुक और प्रासंगिक है जितना उस दौर में था। गीतकार रवि ने इस गाने के बोल इतनी संवेदनशीलता के साथ लिखे थे कि सुनने वाला हर व्यक्ति अपनी जिंदगी के किसी न किसी पहलू से इसे जोड़ लेता है। गाने में एक गरीब व्यक्ति अमीर परिवारों को औलाद का सुख देने की दुआ करता नजर आता है। यह दुआ इतनी शुद्ध और निस्वार्थ है कि आज के भागदौड़ भरे समय में भी लोग इसे सुनकर भावुक हो जाते हैं। फिल्म के निर्देशक देवेन्द्र गोयल ने इस गाने को कहानी के दो अहम पड़ावों पर फिल्माया था, जिससे इसकी प्रभावशीलता और बढ़ गई।
मोहम्मद रफी और आशा भोसले की जादुई आवाज
इस गाने को अमर बनाने में सबसे बड़ा योगदान मोहम्मद रफी और आशा भोसले की आवाज का रहा। मोहम्मद रफी की भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी आवाज ने गाने के हर शब्द में जान डाल दी। उनकी आवाज में गरीब की पीड़ा और उसकी दुआ का दर्द साफ महसूस होता है। आशा भोसले की मीठी और कोमल आवाज ने गाने को और भी भावनात्मक बना दिया। दोनों कलाकारों की जुगलबंदी इतनी बेमिसाल थी कि गाना सिर्फ फिल्म का हिस्सा न रहकर आम लोगों की जुबान पर चढ़ गया। आज भी जब यह गाना सुनाई देता है तो कानों में रफी साहब की आवाज गूंजने लगती है और दिल को छू लेने वाला अहसास पैदा होता है। संगीत प्रेमी इस गाने को रफी-आशा की सर्वश्रेष्ठ जुगलबंदियों में गिनते हैं।
फिल्म एक फूल दो माली में गाने का महत्व
फिल्म एक फूल दो माली में संजय खान, साधना और बलराज साहनी ने मुख्य किरदार निभाए थे। कहानी गरीब लड़की सोमना के इर्द-गिर्द घूमती है जिसका प्यार अमर पर्वतारोहण के दौरान लापता हो जाता है। गर्भवती सोमना की मदद के लिए विधुर कैलाश उससे शादी कर लेता है और बच्चे को अपना बेटा मान लेता है। गाना औलाद वालों फूलों फलों को फिल्म में दो अलग-अलग संदर्भों में दिखाया गया है। पहले हिस्से में कैलाश अपने परिवार के बिछड़ने के बाद गाना गाकर रोटी कमाने वालों पर गुस्सा जाहिर करता है। दूसरे हिस्से में जब वह बच्चे का पिता बन जाता है तो उन्हीं गाने वालों को बक्शीश देते हुए भावुक नजर आता है। इस दोहरे उपयोग ने गाने को कहानी का अभिन्न अंग बना दिया।
गाने के भावुक बोल और उनकी गहराई
गाने के बोल अत्यंत सरल लेकिन गहरे अर्थ लिए हुए हैं। औलाद वालों फूलों फलों, भूखे गरीब की ये ही दुआ है जैसे शब्द सुनकर हर कोई सोचने पर मजबूर हो जाता है। गाने में गरीब व्यक्ति की कामना है कि अमीर घर बच्चों से भरा रहे, बाग हमेशा हरा रहे और घर में गुड़िया-गुड्डे का शोर मचा रहे। यह दुआ इतनी निस्वार्थ है कि इसमें किसी तरह का स्वार्थ या ईर्ष्या नहीं झलकती। गीतकार रवि ने इन बोलों के माध्यम से समाज के दो वर्गों के बीच भावनात्मक सेतु बनाने की कोशिश की थी। आज भी जब कोई इस गाने को सुनता है तो उसकी आंखें नम हो जाती हैं क्योंकि इसमें छिपा दर्द और आशीर्वाद दोनों ही कालजयी हैं।
फिल्म के अन्य यादगार गीत
एक फूल दो माली फिल्म में औलाद वालों फूलों फलों के अलावा कई अन्य सुंदर गाने भी शामिल थे। सजना सजाना ओ सजना को आशा भोसले ने अपनी आवाज दी थी। ये पर्दा हटा दो में मोहम्मद रफी और आशा भोसले की जुगलबंदी फिर से सुनने को मिली। सैयां ले गई जिया तथा तुझे सूरज कहूं या चंदा जैसे गाने भी काफी लोकप्रिय हुए। ओ नन्हें से फरिश्ते को मोहम्मद रफी ने स्वर दिए थे जबकि किसमत के खेल निराले और चल चल रे नौजवान जैसे गीत भी फिल्म की संगीत यात्रा को समृद्ध बनाते हैं। इन सभी गानों ने मिलकर फिल्म के संगीत को यादगार बना दिया था।
आज भी क्यों लोकप्रिय है ये गाना
समय के साथ कई गाने इतिहास के पन्नों में दब गए लेकिन औलाद वालों फूलों फलों आज भी मोहल्लों की गलियों में सुनाई देता है। इसकी लोकप्रियता का कारण इसकी भावुकता और सरलता है। लोग इसे सिर्फ पुराना गाना न मानकर जीवन का सच मानते हैं। सोशल मीडिया और यूट्यूब जैसे मंचों पर भी यह गाना लगातार सुना और शेयर किया जाता है। कई युवा पीढ़ी के लोग भी इसे सुनकर भावुक हो जाते हैं क्योंकि इसमें छिपा संदेश आज भी प्रासंगिक है। गाने की यही खूबी इसे सदाबहार बनाए हुए है और आने वाले समय में भी यह लोगों के दिलों में जिंदा रहेगा।