मध्य प्रदेश। उज्जैन जिले के खाचरौद स्थित रामोला मंदिर (श्रीराम मंदिर) के प्रबंधन और संपत्ति को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ के फैसले को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को चुनौती देने वाली अपील पहली ही सुनवाई में खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई उचित आधार नहीं है।
मंदिर और संपत्ति के स्वामी भगवान श्रीराम
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि रामोला मंदिर और उससे संबंधित सभी चल-अचल संपत्तियों के एकमात्र वास्तविक स्वामी भगवान श्रीराम हैं। मंदिर की संपत्ति को किसी निजी जागीर की तरह वसीयत या समझौते के आधार पर किसी समाज को सौंपा नहीं जा सकता। अदालत के अनुसार, राज्य सरकार की भूमिका मंदिर के प्रबंधन तक सीमित रहेगी। देवस्थान का नियंत्रण और प्रबंधन प्रदेश शासन के राजस्व विभाग के पास रहेगा।
पुजारी की नियुक्ति का अधिकार निजी संस्था को नहीं
फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया था कि माहेश्वरी समाज या किसी अन्य निजी संस्था को मंदिर के पुजारी की नियुक्ति करने अथवा उन्हें पद से हटाने का वैधानिक अधिकार नहीं है। मंदिर के प्रबंधन और पुजारी से जुड़े अधिकारों को लेकर लंबे समय से कानूनी विवाद चल रहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील में हस्तक्षेप से किया इनकार
जानकारी के मुताबिक, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने 25 अगस्त 2026 को इस मामले में फैसला सुनाया था। न्यायमूर्ति विनय सराफ ने मंदिर की संपत्ति को निजी जागीर मानने के तर्क को स्वीकार नहीं किया था। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पहली ही सुनवाई में अपील खारिज करते हुए हाई कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद रामोला मंदिर की संपत्ति और प्रबंधन को लेकर हाई कोर्ट द्वारा तय की गई व्यवस्था बरकरार रही है।