रायपुर। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद को खत्म करने की केंद्रीय सरकार की डेडलाइन अब नज़दीक है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लगातार हर छत्तीसगढ़ दौरे में 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को मिटाने का दावा दोहराया है। बीजेपी सरकार बनने के बाद नक्सल मोर्चे पर आर-पार की कार्रवाई तेज हुई है। सुरक्षा बलों के आंकड़े सरकार के पक्ष में हैं, लेकिन विपक्ष की आवाज़ भी उतनी ही तेज़ है। साल 2025 सुरक्षा बलों और पुलिस के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ है। अलग-अलग मुठभेड़ों में 256 नक्सली ढेर किए गए, जिनमें बड़े कैडर और वरिष्ठ कमांडर भी शामिल थे।
मुख्य नक्सली नेताओं के नाम
1. नम्बाला केशव राव (Basavaraju) – CPI (Maoist) के जनरल सेक्रेटरी और शीर्ष कमांडर।
2. कट्टा रामचंद्र रेड्डी (Raju Dada) – सेंट्रल कमेटी के वरिष्ठ नेता।
3. कद्री सत्यनारायण रेड्डी (Kosa Dada) – सेंट्रल कमेटी में उच्च रैंक का कमांडर। अन्य स्थानीय कमांडर: सरवन मदकम (विश्वनाथ), राजेश (राकेश हेमला), बांसती कुनजाम (हिडमे)। इन ऑपरेशनों को नक्सल नेटवर्क कमजोर करने में ऐतिहासिक सफलता माना जा रहा है।
मुख्य आंकड़े
10 CC और 5 सेंट्रल कमेटी के नक्सली मुख्यधारा में लौटे। 950 से अधिक IED बरामद कर नष्ट किए गए। 664 हथियार, जिनमें 232 ऑटोमेटिक वेपन शामिल थे। सुरक्षा बलों ने 23 जवानों की शहादत दी, जबकि नक्सल हिंसा में 46 आम नागरिकों की मौत हुई। 1562 नक्सलियों ने सरेंडर किया, जबकि 884 को गिरफ्तार किया गया। पिछले दो साल में 12 करोड़ के इनामी नक्सली ढेर किए गए। सुरक्षा स्थिति मजबूत करने के लिए साल 2025 में 52 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए: 22 अबूझमाड़, 18 बीजापुर और 12 सुकमा में। इन आंकड़ों के आधार पर सरकार दावा करती है कि नक्सल नेटवर्क की कमर तोड़ दी गई है।
सरकार का नजरिया
छत्तीसगढ़ सरकार का कहना है कि नक्सलियों के खिलाफ रणनीति, टेक्नोलॉजी और ज़मीनी पकड़ ने नक्सलवाद को कमजोर किया है। बीजेपी इसे “गोल्डन ईयर” मान रही है। उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने इसमें कहा है कि "जहां पहले नक्सली दबदबा रखते थे, अब स्कूल खुल रहे हैं, सड़कें बन रही हैं, एंबुलेंस दौड़ रही हैं। यह जंग आसान नहीं थी। सालों की हिंसा, सैकड़ों शहादतें और हज़ारों उजड़े परिवार इस लड़ाई की कीमत हैं। लेकिन इच्छाशक्ति, सख्त रणनीति और विकास के मॉडल ने नक्सलवाद की आग को ठंडा करना शुरू कर दिया है।" इसके आलावा सरकार यह भी दावा कर रही है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में स्कूल, सड़क, स्वास्थ्य और विकास परियोजनाओं के जरिए स्थानीय लोगों का विश्वास लौट रहा है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
वहीं, विपक्ष का कहना है कि आंकड़ों के पीछे ज़मीनी हकीकत अभी भी सवालों के घेरे में है। कांग्रेस का कहना है कि छग में नक्सलवाद का खात्मा हर एक व्यक्ति चाहता है, मगर क्या चुनिंदा उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाया जा रहा है? जहां नक्सली रहते थे वहां से नक्सली हटाए गए, फिर उस जगह को उद्योगपतियों को सौंप दिया गया। बीजेपी सरकार दोहरी बातें करती है। सरकार को मूलभूत सुविधाओं पर काम करना होगा तभी नक्सलवाद की विचारधारा का खात्मा होगा।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बदलाव
एक समय था जब छत्तीसगढ़ के जंगलों और गांवों में लाल रंग का मतलब था डर। रातें बंदूक की नली के साए में गुजरती थीं, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। जहां कभी नक्सली का दबदबा था, वहां धीरे-धीरे विकास की रौशनी लौट रही है। गांवों में स्कूल, सड़कें और स्वास्थ्य सुविधाएं खुल रही हैं। एंबुलेंस और सरकारी वाहन अब ग्रामीण इलाकों में पहुंच रहे हैं। यह बदलाव स्थानीय लोगों के जीवन में सुरक्षा और उम्मीद ला रहा है। सरकार इसे नक्सलवाद के अंत की दिशा में बड़ा कदम मान रही है, लेकिन विशेषज्ञ और विपक्ष इसे अभी भी सावधानी से देखने की सलाह दे रहे हैं।
नक्सलवाद के खिलाफ यह लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सरकार इसे सुरक्षा और विकास का मुद्दा मान रही है, जबकि विपक्ष इसे भरोसे का सवाल बता रहा है। क्या 31 मार्च 2026 की डेडलाइन वास्तव में इतिहास रचेगी, या यह सिर्फ़ राजनीतिक बयानबाज़ी बनकर रह जाएगी? यह जवाब अब सिर्फ़ समय ही दे सकता है। विपक्ष इसे भरोसे का सवाल मानता है। क्या 31 मार्च 2026 की डेडलाइन इतिहास रचेगी, या यह सिर्फ़ राजनीतिक बयानबाज़ी बनकर रह जाएगी? इसका जवाब समय ही देगा।
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