नई दिल्ली. भारत और अमेरिका के बीच होने वाला ‘युद्ध अभ्यास 2026’ इस बार कई मायनों में विशेष महत्व रखता है। सितंबर के पहले सप्ताह में आयोजित होने वाले इस सैन्य अभ्यास का एक प्रमुख चरण उत्तराखंड के औली क्षेत्र में होगा, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा के अपेक्षाकृत निकट स्थित है। ऐसे समय में जब एशिया में सामरिक संतुलन और सीमा सुरक्षा के मुद्दे लगातार चर्चा में बने हुए हैं, इस क्षेत्र में संयुक्त अभ्यास का आयोजन दोनों देशों की बढ़ती रक्षा साझेदारी का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है। लगभग 350-350 सैनिकों की भागीदारी वाला यह अभ्यास उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में युद्ध संचालन की जटिलताओं को समझने और संयुक्त क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
औली का चयन क्यों बना सामरिक दृष्टि से अहम
समुद्र तल से लगभग ढाई हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित औली केवल एक पर्यटन स्थल ही नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। वर्ष 2020 के बाद से भारतीय सेना ने पर्वतीय युद्धक तैयारियों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है और ऐसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी है जहां सैनिकों को कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। औली में कम ऑक्सीजन, चुनौतीपूर्ण मौसम और दुर्गम भूभाग जैसी परिस्थितियां सैनिकों को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों का अनुभव प्रदान करेंगी। यही कारण है कि इस क्षेत्र को संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त माना गया है, जहां दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के अनुभवों और तकनीकों से सीख सकेंगी।
पहली बार अपाचे हेलीकॉप्टरों की गड़गड़ाहट बढ़ाएगी ताकत
इस वर्ष के युद्धाभ्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पहली बार एएच-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टरों को शामिल किया जाएगा। आधुनिक युद्धक्षेत्र में अपाचे हेलीकॉप्टरों को अत्यंत प्रभावी आक्रामक मंच माना जाता है, जो दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों, सैन्य ठिकानों और सामरिक लक्ष्यों पर सटीक प्रहार करने की क्षमता रखते हैं। इन हेलीकॉप्टरों की भागीदारी से थल और वायु सेना के बीच बेहतर समन्वय विकसित करने का अवसर मिलेगा। संयुक्त अभियान, त्वरित प्रतिक्रिया, सटीक निशानेबाजी और हवाई सहायता जैसी क्षमताओं का परीक्षण इस अभ्यास के दौरान किया जाएगा, जिससे दोनों सेनाओं की परिचालन दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।
पहाड़ों से लेकर रेगिस्तान तक युद्ध कौशल की होगी परीक्षा
युद्ध अभ्यास 2026 को दो भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में आयोजित करने का निर्णय इसकी व्यापकता को दर्शाता है। जहां औली में सैनिक पर्वतीय युद्धक परिस्थितियों का अभ्यास करेंगे, वहीं राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में उन्हें रेगिस्तानी वातावरण में सैन्य अभियानों का अनुभव प्राप्त होगा। महाजन क्षेत्र में लाइव फायरिंग, बख्तरबंद सैन्य वाहनों की गतिविधियां, तोपखाने की मारक क्षमता और वायु समर्थन के साथ समन्वित संचालन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इस प्रकार सैनिकों को विविध युद्ध परिस्थितियों में अपनी क्षमताओं को परखने और उन्हें और अधिक प्रभावी बनाने का अवसर मिलेगा।
अलास्का से भारत तक, बदलते युद्ध प्रशिक्षण का विस्तार
पिछले वर्ष आयोजित युद्ध अभ्यास 2025 का आयोजन अमेरिका के अलास्का क्षेत्र में किया गया था, जहां सैनिकों ने अत्यंत ठंडे और बर्फीले उप-आर्कटिक वातावरण में प्रशिक्षण प्राप्त किया था। उस अनुभव ने दोनों सेनाओं को चरम मौसम में संचालन की महत्वपूर्ण सीख प्रदान की थी। इस बार अभ्यास का स्वरूप और भी व्यापक हो गया है क्योंकि सैनिकों को पर्वतीय और रेगिस्तानी दोनों प्रकार की परिस्थितियों में प्रशिक्षण मिलेगा। यह विविधता आधुनिक युद्ध की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है, जहां किसी भी भूभाग और मौसम में प्रभावी सैन्य कार्रवाई की क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
दो दशकों में मजबूत हुई भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी
वर्ष 2004 में एक सीमित द्विपक्षीय सैन्य कार्यक्रम के रूप में शुरू हुआ ‘युद्ध अभ्यास’ आज भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है। शुरुआती वर्षों में इसका मुख्य उद्देश्य आतंकवाद और उग्रवाद विरोधी अभियानों पर केंद्रित था, लेकिन समय के साथ इसकी विषयवस्तु और दायरा दोनों विस्तृत हुए हैं। वर्तमान में इसमें उच्च पर्वतीय युद्ध, मानवीय सहायता, आपदा राहत, संयुक्त सैन्य अभियान और बहु-आयामी सुरक्षा चुनौतियों से निपटने जैसे विषय शामिल किए जाते हैं। यह विकास दर्शाता है कि दोनों देश केवल सामरिक साझेदार ही नहीं, बल्कि वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण सहयोगी भी बन चुके हैं।