नई दिल्ली. भारतीय सेना अपने स्वदेशीकरण निदेशालय की कार्यप्रणाली में व्यापक बदलाव की तैयारी कर रही है। इसका उद्देश्य विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम करना, देश में हथियारों और सैन्य उपकरणों का उत्पादन बढ़ाना और सेना की परिचालन क्षमता को मजबूत करना है। सेना ने 20 अक्तूबर को इस संबंध में अध्ययन करने और भविष्य की रणनीति तैयार करने के लिए सलाहकारों से रुचि अभिव्यक्ति यानी ईओआई आमंत्रित की है। मौजूदा प्रक्रियाओं और प्रबंधन व्यवस्था की समीक्षा कर बेहतर रणनीति तैयार की जाएगी। इस पहल से आयात पर निर्भरता घटाने का लक्ष्य है।
बदलाव की जरूरत क्यों महसूस हुई
भारतीय सेना में स्वदेशीकरण से जुड़ी कई परियोजनाएं पहले से चल रही हैं। इसके बावजूद सेना का मानना है कि इन पहलों को एक एकीकृत व्यवस्था के तहत लाने की जरूरत है। इसके लिए मौजूदा प्रक्रियाओं, प्रबंधन व्यवस्था, तकनीकी क्षमताओं और रक्षा उद्योग के साथ तालमेल की समीक्षा की जाएगी। अध्ययन के दौरान मौजूदा व्यवस्था की कमियों और कामकाज में आ रही बाधाओं की पहचान की जाएगी। साथ ही बेहतर अंतरराष्ट्रीय कार्यप्रणालियों का अध्ययन कर निदेशालय में बदलाव के लिए व्यापक रणनीति तैयार की जाएगी। उपलब्ध कर्मचारियों और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करते हुए परियोजनाओं की सफलता बढ़ाने का लक्ष्य है।
निदेशालय क्या काम करता है
स्वदेशीकरण निदेशालय सेना में इस्तेमाल होने वाले आयातित उपकरणों और कलपुर्जों के स्वदेशी विकल्प विकसित करने की दिशा में काम करता है। इसका उद्देश्य ऐसी वस्तुओं का घरेलू उत्पादन बढ़ाना है जिनके लिए सेना को विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता है। निदेशालय यह भी आकलन करता है कि किसी रक्षा उपकरण का देश में निर्माण आर्थिक रूप से कितना व्यावहारिक है। इस दौरान उपकरण की संभावित मांग, भविष्य में उसकी जरूरत, बड़े पैमाने पर उत्पादन की लागत, उसकी शेष उपयोग अवधि और लंबे समय तक उसकी आवश्यकता जैसे पहलुओं पर विचार किया जाता है। आयुध, वाहन, विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों सहित विभिन्न श्रेणियों का स्वदेशीकरण इसके कार्यक्षेत्र में शामिल है।
तकनीकी विकास और अनुसंधान पर जोर
प्रस्तावित बदलाव के तहत स्वदेशीकरण के अलावा सैन्य उपकरणों के उन्नयन, वैकल्पिक तकनीकी समाधानों और कलपुर्जों व उप-प्रणालियों के अनुसंधान एवं विकास पर भी ध्यान दिया जाएगा। इसका उद्देश्य केवल नए उपकरण विकसित करना नहीं बल्कि मौजूदा उपकरणों की क्षमता में सुधार करना और सेना की जरूरतों के अनुरूप विकल्प तैयार करना भी है। अध्ययन में निदेशालय की कार्यप्रणाली, संस्थागत ढांचे, प्रबंधन व्यवस्था और तकनीकी विकास से जुड़े पहलुओं की समीक्षा की जाएगी। रक्षा क्षेत्र की सार्वजनिक और निजी कंपनियों के साथ बेहतर तालमेल के उपाय भी सुझाए जा सकते हैं। अभी यह अध्ययन और रणनीति तैयार करने का चरण है।
रक्षा उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि
रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का वार्षिक रक्षा उत्पादन बढ़कर रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये हो गया। वित्त वर्ष 2024-25 में यह 1.54 लाख करोड़ रुपये था। इस तरह एक वर्ष में रक्षा उत्पादन में 15.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2020-21 में देश का रक्षा उत्पादन 84,643 करोड़ रुपये था। इसके मुकाबले 2025-26 में इसमें करीब 110 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वर्ष 2013-14 में यह आंकड़ा 43,746 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की हिस्सेदारी करीब 76 प्रतिशत रही जबकि निजी क्षेत्र का योगदान 24 प्रतिशत था।
सेना को मिलने वाले संभावित लाभ
स्वदेशीकरण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होने से सेना की विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता घट सकती है। देश में कलपुर्जों और उपकरणों के विकल्प उपलब्ध होने से उनकी मरम्मत, रखरखाव और जरूरत के अनुसार उन्नयन में भी मदद मिल सकती है। इसके अलावा घरेलू रक्षा उद्योग को नई तकनीक विकसित करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के अवसर मिल सकते हैं। इन संभावित लाभों की वास्तविक सीमा अध्ययन के निष्कर्षों और उसके बाद लागू किए जाने वाले उपायों पर निर्भर करेगी। सेना की परिचालन क्षमता मजबूत होने की उम्मीद है।
आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
भारतीय सेना की यह पहल रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की होगी कि स्वदेशीकरण परियोजनाएं सेना की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप हों, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो और विदेशी आयात पर निर्भरता कम करने के लक्ष्य को प्रभावी ढंग से पूरा किया जा सके। निदेशालय इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग कोर के अंतर्गत काम करता है। अध्ययन के बाद रणनीति लागू होने पर दीर्घकालिक लाभ मिलने की संभावना है। रक्षा उत्पादन में हो रही वृद्धि इस दिशा में सकारात्मक संकेत है।