इस वर्ष मानसून की कमजोर शुरुआत का सीधा असर खरीफ फसलों की बुआई पर पड़ा है। धान, दालों और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में कम दर्ज किया गया है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अगले कुछ सप्ताह में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिसका असर आने वाले महीनों में खाद्य बाजार पर दिखाई देगा। कमजोर बुआई के कारण किसानों की चिंता बढ़ी है, वहीं उपभोक्ताओं को भी बढ़ती महंगाई का सामना करना पड़ सकता है।
धान की कम बुआई से चावल की कीमतों पर बढ़ा दबाव
धान की खेती में आई गिरावट का असर चावल की कीमतों पर दिखने लगा है। जून महीने में चावल की महंगाई दर बढ़कर 1.72 प्रतिशत पहुंच गई, जबकि मई में यह 0.23 प्रतिशत थी। 10 जुलाई तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार धान का कुल रकबा पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 8.63 प्रतिशत कम रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बुआई का दायरा जल्द नहीं बढ़ा तो आगामी सीजन में चावल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे खुदरा बाजार में कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बनेगा।
दालों की खेती घटी, भविष्य की आपूर्ति को लेकर चिंता गहराई
दालों के उत्पादन को लेकर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। तूर (अरहर), उड़द और मूंग की बुआई में क्रमशः 30.29 प्रतिशत, 29.71 प्रतिशत और 10.62 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इसका असर महंगाई के ताजा आंकड़ों में भी दिखाई देने लगा है। तूर, उड़द और मूंग की कीमतों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी दर्ज हो रही है। कृषि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि दालें मौसमी फसलें होती हैं, इसलिए बुआई में कमी का असर सीधे भविष्य की उपलब्धता पर पड़ता है। यदि उत्पादन घटता है तो बाजार में आपूर्ति सीमित होने के कारण कीमतों में और तेजी आ सकती है।
तिलहन और मोटे अनाज भी हुए प्रभावित
केवल धान और दालें ही नहीं, बल्कि तिलहन फसलों की बुआई में भी 21.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इसका असर सरसों, सोयाबीन और सूरजमुखी से बनने वाले खाद्य तेलों की कीमतों पर पड़ सकता है। इसके अलावा ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाज भी महंगे होने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि उत्पादन अनुमान से कम रहता है तो खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है, जिससे वैश्विक बाजार की कीमतों का असर भी घरेलू उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
मानसून की चाल तय करेगी महंगाई की दिशा
अर्थशास्त्रियों और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे। भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार इस वर्ष जून में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई, जिसके कारण खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हुई। विभाग के अनुसार देश के 44 प्रतिशत से अधिक जिलों में अब भी सामान्य से कम बारिश हुई है। यदि मानसून जल्द सक्रिय होकर पर्याप्त वर्षा देता है तो फसलों की स्थिति में कुछ सुधार संभव है। हालांकि यदि बारिश का यह कमजोर दौर जारी रहा तो खाद्य महंगाई पर दबाव और बढ़ सकता है, जिसका असर आम परिवारों की रसोई से लेकर देश की अर्थव्यवस्था तक महसूस किया जा सकता है।