नई दिल्ली - मानसून की वापसी शुरू होने के साथ ही देश में धान और चावल के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ गई है। इस साल कमजोर बारिश का असर धान के रकबे के साथ-साथ फसल की उत्पादकता पर भी पड़ने की आशंका है। कृषि और बाजार से जुड़े अनुमानों के मुताबिक, 2026 में भारत का चावल उत्पादन पिछले साल के रिकॉर्ड स्तर से करीब 1 करोड़ टन कम रह सकता है। इससे घरेलू कीमतों और निर्यात बाजार पर दबाव बढ़ने की संभावना है। हालांकि, सरकारी भंडार में पर्याप्त स्टॉक होने से तत्काल आपूर्ति संकट की आशंका कम है।

पिछले रिकॉर्ड से 1 करोड़ टन कम हो सकता है उत्पादन
पिछले साल भारत में चावल का उत्पादन करीब 15.4 करोड़ टन रहा था। इस साल यह घटकर लगभग 14.4 करोड़ टन रह सकता है। रॉयटर्स के मुताबिक, करीब 10 मिलियन टन की यह संभावित गिरावट लगभग दो दशक में सबसे बड़ी गिरावट हो सकती है। कमजोर मानसून और धान के रकबे में कमी को इसके प्रमुख कारणों में माना जा रहा है। खरीफ सीजन का धान देश के कुल चावल उत्पादन में 80 प्रतिशत से अधिक योगदान देता है। इसलिए खरीफ धान के रकबे और पैदावार में बदलाव का सीधा असर देश के कुल चावल उत्पादन पर पड़ता है।

धान का रकबा भी घटा
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 4 सितंबर तक देश में धान का रकबा 421.82 लाख हेक्टेयर था, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 438.19 लाख हेक्टेयर था। यानी करीब 16.37 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई। बाद के आंकड़ों में यह रकबा करीब 429.28 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा, लेकिन यह भी पिछले साल के 445.92 लाख हेक्टेयर से लगभग 16.64 लाख हेक्टेयर कम है। रिपोर्टों के मुताबिक कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों में धान के रकबे में कमी प्रमुख कारणों में शामिल है।
कमजोर बारिश ने बढ़ाई चिंता
इस साल मानसून के दौरान देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश हुई है। 19 सितंबर तक देश में संचयी मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 15 प्रतिशत कम रही। इसी दिन पश्चिमी राजस्थान से दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी भी शुरू हो गई। कम बारिश का असर केवल बुवाई के रकबे पर नहीं पड़ा है। धान की फसल के अंतिम चरण में पर्याप्त नमी नहीं मिलने पर प्रति हेक्टेयर उपज प्रभावित होने की आशंका भी बढ़ जाती है। ऐसे में कम रकबे के साथ उत्पादकता में संभावित गिरावट कुल उत्पादन को और नीचे खींच सकती है।
सिर्फ धान नहीं, दूसरी खरीफ फसलें भी प्रभावित
कमजोर मानसून का असर दूसरी खरीफ फसलों पर भी दिखाई दे रहा है। 4 सितंबर तक मक्का का रकबा पिछले साल के मुकाबले करीब 2.99 लाख हेक्टेयर कम था, जबकि सोयाबीन का रकबा करीब 1.16 लाख हेक्टेयर घटा। दूसरी ओर अरहर और उड़द जैसी कुछ दलहनी फसलों के रकबे में बढ़ोतरी दर्ज हुई। कुल खरीफ क्षेत्र भी पिछले साल की समान अवधि की तुलना में कम रहा है। इससे कृषि उत्पादन और ग्रामीण आय पर मौसम के प्रभाव को लेकर चिंता बनी हुई है।
चावल की कीमतों पर पड़ सकता है असर
उत्पादन घटने की आशंका के बीच घरेलू बाजार में चावल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। रॉयटर्स के अनुसार, उत्पादन में कमी की आशंका के बीच घरेलू चावल कीमतों में तेजी और भारतीय निर्यात कीमतों में भी बढ़ोतरी देखी गई है। हालांकि, फिलहाल भारत के पास पर्याप्त सरकारी स्टॉक मौजूद है। 1 सितंबर तक सरकारी चावल भंडार करीब 5.96 करोड़ टन था, जो सरकार के निर्धारित लक्ष्य से काफी अधिक है। यही बफर स्टॉक उत्पादन में संभावित कमी के बावजूद घरेलू आपूर्ति और निर्यात को तत्काल झटका लगने से बचाने में मदद कर सकता है।
अल नीनो और मौसम की चुनौती
आने वाले महीनों में मौसम की स्थिति भी कृषि क्षेत्र के लिए अहम रहेगी। 2026 के मानसून पर मजबूत होते अल नीनो प्रभाव को भी कमजोर बारिश के प्रमुख मौसमीय कारकों में गिना जा रहा है। ऐसे में अब निगाहें नई धान की फसल की वास्तविक उपज और सरकारी खरीद के आंकड़ों पर रहेंगी। यदि उत्पादन अनुमान के मुताबिक घटता है, तो घरेलू कीमतों, सरकारी स्टॉक और चावल निर्यात—तीनों पर इसका असर दिखाई दे सकता है।