नई दिल्ली: देश में प्याज की कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जून से सितंबर के बीच प्याज के खुदरा भाव में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 1 जून को प्याज का औसत खुदरा भाव 29.50 रुपये प्रति किलो था, जो 17 सितंबर को बढ़कर 53.78 रुपये प्रति किलो पहुंच गया। यानी करीब साढ़े तीन महीने में प्याज के दाम में 82.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। खुदरा बाजार के साथ-साथ थोक मंडियों में भी प्याज की कीमतों में बड़ा उछाल आया है। जून की तुलना में थोक भाव करीब दोगुने स्तर तक पहुंच गए हैं।
थोक बाजार में भी प्याज हुआ महंगा
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1 जून को प्याज का औसत थोक भाव 22.60 रुपये प्रति किलो था। इसके बाद कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिली। 10 सितंबर को थोक भाव 46.20 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया, जबकि 17 सितंबर को यह 45.68 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया। इस तरह जून की तुलना में थोक बाजार में प्याज की कीमत लगभग दोगुनी हो गई। थोक भाव बढ़ने का सीधा असर खुदरा बाजार पर भी दिखाई देता है। मंडियों में महंगा प्याज पहुंचने से खुदरा विक्रेताओं को भी इसे अधिक कीमत पर बेचना पड़ता है।
महाराष्ट्र में फसल खराब होने से बढ़ी कीमत
प्याज की कीमतों में तेजी के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें महाराष्ट्र में गर्मियों की फसल को नुकसान और मंडियों में आवक कम होना प्रमुख वजह है। महाराष्ट्र देश के प्रमुख प्याज उत्पादक राज्यों में शामिल है। ऐसे में वहां से आने वाली सप्लाई प्रभावित होने का असर दूसरे बाजारों पर भी पड़ता है। इसके अलावा कर्नाटक से भी प्याज की आवक कम हुई है, जिससे बाजार में उपलब्धता पर दबाव बढ़ा है।
नई खरीफ फसल की आवक में देरी
पुरानी फसल का स्टॉक कम होने और नई खरीफ फसल की आवक में देरी ने भी प्याज की कीमतों को बढ़ाने में भूमिका निभाई है। इस अवधि में बाजार में मांग बनी रहती है, जबकि नई फसल की पर्याप्त मात्रा मंडियों में पहुंचने में समय लगता है। ऐसे में उपलब्ध प्याज की कीमत बढ़ने लगती है। हालांकि, नई खरीफ फसल की आवक बढ़ने के साथ आने वाले समय में कीमतों में नरमी की उम्मीद जताई जा रही है।
सरकार प्याज के दाम नियंत्रित करने के लिए क्या करती है?
प्याज की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी होने पर सरकार बाजार में उपलब्धता बढ़ाने और उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए कई कदम उठाती है।
बफर स्टॉक से बाजार में प्याज की सप्लाई
सरकार किसानों और उत्पादक क्षेत्रों से प्याज खरीदकर उसका बफर स्टॉक तैयार करती है। कीमतें बढ़ने पर इस स्टॉक से प्याज बाजार में उतारा जाता है। कई मौकों पर सरकार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए बफर स्टॉक के प्याज को बाजार से कम कीमत पर उपलब्ध कराती है। इससे बढ़ती कीमतों के बीच आम लोगों को कुछ राहत मिल सकती है।
निर्यात पर भी लिए जाते हैं फैसले
देश में प्याज की उपलब्धता कम होने पर सरकार निर्यात नीति में बदलाव कर सकती है। इसमें निर्यात शुल्क बढ़ाना या अन्य प्रतिबंधात्मक कदम शामिल हो सकते हैं। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में प्याज की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों में तेज उछाल को नियंत्रित करना होता है।
अगस्त-सितंबर में क्यों बढ़ते हैं प्याज के दाम?
प्याज की कीमतों में अगस्त और सितंबर के दौरान तेजी कोई असामान्य स्थिति नहीं है। इस समय कई कारक एक साथ बाजार को प्रभावित करते हैं।
1. त्योहारों में बढ़ जाती है मांग
रक्षाबंधन, गणेश उत्सव और आने वाले त्योहारों के दौरान खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ती है। प्याज की मांग बढ़ने से इसकी कीमत पर भी दबाव बन सकता है।
2. बारिश से सप्लाई चेन प्रभावित
मानसून के दौरान बारिश का असर सड़क परिवहन, मंडियों में आवक और स्टोरेज पर पड़ सकता है। खराब मौसम के कारण कई बार कृषि उपज मंडियों तक पहुंचने में देरी होती है।
3. पुरानी फसल का स्टॉक घटता है
इस समय पुरानी फसल का स्टॉक धीरे-धीरे खत्म होने लगता है, जबकि नई खरीफ फसल की पर्याप्त आवक शुरू होने में समय लगता है। सप्लाई और मांग के बीच यह अंतर कीमतों में बढ़ोतरी का कारण बन सकता है।
आम लोगों की जेब पर बढ़ा बोझ
प्याज भारतीय रसोई में रोजमर्रा के इस्तेमाल वाली प्रमुख सब्जियों में शामिल है। इसलिए इसके दाम में बड़ी बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ता है। सरकार की ओर से बफर स्टॉक के जरिए प्याज उपलब्ध कराने और सप्लाई बढ़ाने जैसे कदमों से कुछ राहत मिल सकती है। वहीं, नई खरीफ फसल की आवक बढ़ने पर बाजार में प्याज की उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद है।