टीकमगढ़: मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के चंद्रपुरा गांव में बुंदेली बोली और स्थानीय संस्कृति को सहेजने के लिए अनोखी पहल की गई है। ग्राम पंचायत और ग्रामीणों ने मिलकर गांव में एक खास स्थान विकसित किया है, जिसे ‘अथाई’ नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य बुंदेली भाषा के उन शब्दों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है, जो धीरे-धीरे बोलचाल से गायब होते जा रहे हैं। ‘अथाई’ में बुंदेली बोली के ऐसे शब्द दीवारों पर लिखे गए हैं, जिनका इस्तेमाल अब कम होता जा रहा है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि इस पहल से बच्चों और युवाओं को अपनी स्थानीय भाषा और परंपराओं से जोड़ने में मदद मिलेगी।
दीवारों पर लिखे जा रहे बुंदेली के पुराने शब्द
गांव में तैयार की गई ‘अथाई’ की दीवारों पर बुंदेली बोली के विलुप्त होते शब्द लिखे गए हैं। इसका मकसद सिर्फ शब्दों को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी और नई पीढ़ी की बातचीत का हिस्सा बनाना भी है। ग्रामीणों के मुताबिक, आज की पीढ़ी स्थानीय बोली के कई पुराने शब्दों से परिचित नहीं है। ऐसे में दीवारों पर इन शब्दों को लिखकर उन्हें सार्वजनिक स्थान पर प्रदर्शित किया गया है, ताकि लोग आते-जाते उन्हें पढ़ सकें और उनके अर्थ व इस्तेमाल के बारे में जान सकें।
हल और बैलगाड़ी भी बनी संस्कृति की पहचान
‘अथाई’ में सिर्फ बुंदेली शब्दों को ही जगह नहीं दी गई है, बल्कि बुंदेली संस्कृति और ग्रामीण जीवन से जुड़े पारंपरिक संसाधनों को भी प्रदर्शित किया गया है। यहां हल और बैलगाड़ी को रखा गया है। हल और बैलगाड़ी बुंदेलखंड के पारंपरिक ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। इन्हें यहां रखने का उद्देश्य बच्चों और आने वाली पीढ़ी को यह बताना है कि गांव की पुरानी जीवनशैली और कृषि व्यवस्था कैसी थी।
बच्चों के लिए सीखने की जगह बनी ‘अथाई’
‘अथाई’ अब गांव के लोगों के लिए बैठने और बातचीत करने की जगह भी बन गई है। ग्रामीण यहां बैठकर आपस में बातचीत करते हैं, जबकि बच्चे आसपास खेलते हैं। खेलते-खेलते बच्चों की नजर दीवारों पर लिखे बुंदेली शब्दों पर पड़ती है। इस तरह मनोरंजन के साथ उन्हें अपनी स्थानीय भाषा और संस्कृति के बारे में सीखने का मौका मिल रहा है। गांव के लोगों का मानना है कि अगर बच्चों को बचपन से ही स्थानीय भाषा और परंपराओं से जोड़ा जाए तो बुंदेली बोली को आगे की पीढ़ियों तक पहुंचाना आसान होगा।
कलेक्टर ने भी पहल की सराहना की
टीकमगढ़ के कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय ने ग्राम पंचायत की इस पहल की सराहना की है। उन्होंने ‘अथाई’ को और बेहतर बनाने के लिए सुझाव भी दिए हैं, ताकि बुंदेली बोली और स्थानीय परंपराओं को लंबे समय तक संरक्षित किया जा सके। इस पहल के जरिए ग्रामीण स्तर पर स्थानीय भाषा, संस्कृति और पारंपरिक संसाधनों को एक साथ सहेजने का प्रयास किया जा रहा है।
स्वच्छता के क्षेत्र में भी गांव कर चुका है पहल
चंद्रपुरा ग्राम पंचायत की पहचान सिर्फ बुंदेली भाषा और संस्कृति को बचाने की पहल तक सीमित नहीं है। इससे पहले गांव के सरपंच ने स्वच्छता और ड्रेनेज सिस्टम को लेकर भी काम किया था। ग्राम पंचायत में सबसे पहले ड्रेनेज सिस्टम की शुरुआत की गई, जिससे गांव की गलियों में गंदा पानी सड़कों पर बहने की समस्या को कम करने में मदद मिली। इस पहल के लिए ग्राम पंचायत को राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार भी मिला। अब गांव में बुंदेली भाषा और संस्कृति को बचाने की पहल ‘अथाई’ के रूप में सामने आई है। भाषा, संस्कृति और स्वच्छता से जुड़ी इन पहलों के जरिए चंद्रपुरा अपनी स्थानीय पहचान को सहेजने की कोशिश कर रहा है।