नई दिल्ली - दीपावली के पांच दिवसीय महापर्व में नरक चतुर्दशी का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। इसे छोटी दिवाली, रूप चतुर्दशी और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। वहीं, देश के कुछ हिस्सों में यह पर्व भूत चतुर्दशी और काली चौदस के रूप में भी मनाया जाता है। हर साल यह त्योहार बड़ी दिवाली से एक दिन पहले पड़ता है।
हालांकि, साल 2026 में चतुर्दशी तिथि दो दिनों तक रहने के कारण लोगों के बीच इसकी सही तारीख को लेकर असमंजस बना हुआ है। पंचांग के अनुसार, इस साल नरक चतुर्दशी 8 नवंबर को मनाई जाएगी। इस दिन सुबह अभ्यंग स्नान करने और शाम को यमराज के नाम दीपक जलाने की परंपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और व्यक्ति को नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है।
कब है नरक चतुर्दशी 2026?
हिंदू पंचांग के अनुसार, नरक चतुर्दशी का पर्व हर साल कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। साल 2026 में चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर की सुबह 10 बजकर 47 मिनट पर शुरू होगी और 8 नवंबर की सुबह 11 बजकर 27 मिनट तक रहेगी।
चूंकि धार्मिक पर्वों की तारीख निर्धारित करने में उदया तिथि को विशेष महत्व दिया जाता है, इसलिए इस साल नरक चतुर्दशी का त्योहार 8 नवंबर 2026, रविवार को मनाया जाएगा। इसी दिन छोटी दिवाली से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाएगा।
नरक चतुर्दशी 2026: अभ्यंग स्नान का शुभ मुहूर्त
नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करने की विशेष परंपरा है। इस दौरान शरीर पर तेल लगाकर स्नान किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शुभ मुहूर्त में अभ्यंग स्नान करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और उसे नरक की यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता।
पंचांग में दिए गए समय के अनुसार अभ्यंग स्नान का शुभ मुहूर्त इस प्रकार है:
- - नरक चतुर्दशी की तारीख: 8 नवंबर 2026, रविवार
- - अभ्यंग स्नान का समय: सुबह 05:41 बजे से 06:38 बजे तक
- - चन्द्रोदय का समय: सुबह 05:41 बजे
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा के उदय के समय और सूर्योदय से पहले किया गया स्नान इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है।
छोटी दिवाली पर दीपदान का क्या है महत्व?
नरक चतुर्दशी की शाम को घरों में दीपक जलाने की परंपरा है। इस दिन विशेष रूप से यमराज के नाम का दीपक निकाला जाता है, जिसे यम दीपदान कहा जाता है। मान्यता है कि घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाने से यमराज प्रसन्न होते हैं और परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु के भय से सुरक्षा मिलती है।
इसके अलावा लोग अपने घरों के मुख्य द्वार, आंगन और पूजा स्थल पर दीपक सजाते हैं। ऐसा माना जाता है कि दीपों की रोशनी से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
क्यों मनाई जाती है नरक चतुर्दशी?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर नामक राक्षस के वध से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि नरकासुर ने अपनी शक्तियों के बल पर देवताओं और ऋषियों को परेशान कर रखा था। उसने हजारों महिलाओं को भी बंदी बना लिया था।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का अंत कर बंदी महिलाओं को मुक्त कराया। इसी विजय की खुशी में दीप जलाकर उत्सव मनाया गया। तभी से कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाने की परंपरा प्रचलित हुई।
रूप चतुर्दशी पर क्यों किया जाता है विशेष स्नान?
नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी कहे जाने के पीछे भी खास मान्यता है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर उबटन और तेल लगाकर स्नान करने की परंपरा है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, ऐसा करने से शरीर में सुंदरता और चेहरे पर तेज आता है।
इसी कारण कई स्थानों पर महिलाएं और पुरुष इस दिन विशेष रूप से सौंदर्य संबंधी परंपराओं का पालन करते हैं। इस पर्व का संदेश केवल बाहरी सुंदरता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे मन और विचारों की शुद्धता से भी जोड़कर देखा जाता है।
इस प्रकार नरक चतुर्दशी का त्योहार धार्मिक आस्था, दीपदान, स्नान और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। 8 नवंबर को श्रद्धालु शुभ मुहूर्त में अभ्यंग स्नान और शाम को यम दीपदान करके इस पर्व को मनाएंगे।