सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को पर्यावरण नियमों के उल्लंघन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि, परियोजनाओं के लिए पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त करना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक ठोस सुरक्षा उपाय है। याचिकाकर्ताओं की तरफ से दलील दी गई कि 'प्रदूषणकारी भुगतान करे' के सिद्धांत को 'प्रदूषण फैलाओ और भुगतान करो' में नहीं बदला जाना चाहिए। चीफ जस्टिस (सीजेआइ) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ 'वनशक्ति' फैसले से जुड़ी पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
पीठ ने एक कड़वी सच्चाई साझा की
आपको बता दें कि, यह मामला उन परियोजनाओं को पिछली तारीख से मंजूरी देने से जुड़ा है, जिन्होंने बिना अनिवार्य पर्यावरणीय अनुमति के परिचालन शुरू कर दिया था।अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर देशों की उदासीनता सुनवाई के दौरान जब एडवोकेट सृष्टि अग्निहोत्री ने रियो घोषणापत्र और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलनों का हवाला दिया, तो पीठ ने एक कड़वी सच्चाई साझा की।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बहुत कम कदम उठाते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है कि रियो घोषणा और पेरिस सिद्धांतों जैसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों के बावजूद, कई देश इनसे बचने के रास्ते तलाश रहे हैं। चीफ जस्टिस (सीजेआइ) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की पीठ ने विशेष रूप से अमेरिका और चीन का जिक्र करते हुए कहा कि ये देश इन घोषणाओं के प्रति उदासीन हैं और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बहुत कम कदम उठाते हैं।
सरकार किसी भी परियोजना को ''थोक में'' नियमित नहीं कर रही है
सरकार और कोर्ट के बीच कानूनी बहस केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सालिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कार्यालय ज्ञापन का बचाव किया। ऐश्वर्या भाटी ने स्पष्ट किया कि सरकार किसी भी परियोजना को ''थोक में'' नियमित नहीं कर रही है। उन्होंने आगे कहा कि, उल्लंघन करने वाली इकाइयों को पहले बंद किया जाता है, फिर उन पर भारी जुर्माना लगाया जाता है और उन्हें सुधार योजना सौंपनी होती है। उन्होंने इसे पर्यावरण न्यायशास्त्र का विस्तार बताया।
राज्य और केंद्र सरकारें कानून के शासन की संरक्षक हैं
हालांकि, जस्टिस जोयमाल्या बागची ने प्रवर्तन पर सवाल उठाते हुए कहा कि, राज्य और केंद्र सरकारें कानून के शासन की संरक्षक हैं, वे बिना मंजूरी के चल रही परियोजनाओं से अनभिज्ञ होने का दावा नहीं कर सकतीं। उन्होंने चिंता जताई कि वर्तमान व्यवस्था कहीं पर्यावरण नियमों के पालन की अनिवार्यता को पूरी तरह समाप्त न कर दे। बहरहाल, मामले की सुनवाई अगले सप्ताह भी जारी रहेगी।