कोलकाता: 21 जुलाई 1993 गोलीकांड की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग की रिपोर्ट आखिरकार विधानसभा में पेश कर दी गई। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि 2011 में तत्कालीन सरकार ने इस आयोग का गठन किया था, लेकिन डेढ़ दशक तक इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। 21 जुलाई के कार्यक्रम से ठीक पहले रिपोर्ट का सदन में पेश होना राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने लगाए गंभीर आरोप
रिपोर्ट पेश करते हुए मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि 21 जुलाई की घटना को वर्षों तक राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया। उन्होंने कहा कि इस घटना के नाम पर सत्ता और प्रभाव हासिल किया गया, जबकि आम लोगों को कभी पूरी सच्चाई नहीं बताई गई। मुख्यमंत्री ने दावा किया कि अब रिपोर्ट के माध्यम से कई महत्वपूर्ण तथ्य सार्वजनिक हुए हैं।
रिपोर्ट में पुलिस कार्रवाई पर सवाल
मुख्यमंत्री के अनुसार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पुलिस फायरिंग से हुई मौतों को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिले। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि गोली चलाने के आदेश को लेकर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया और जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।
गवाहों को लेकर भी उठे सवाल
मुख्यमंत्री ने बताया कि आयोग ने कुल 44 लोगों को गवाही के लिए बुलाया था, लेकिन 1993 की घटना की प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी मानी जाने वाली ममता बनर्जी को गवाही के लिए नहीं बुलाया गया। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ प्रमुख व्यक्तियों ने आयोग के सामने गवाही देने से इनकार किया था, जिससे जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं।
1993 में क्या हुआ था?
21 जुलाई 1993 को तत्कालीन युवा कांग्रेस के नेतृत्व में महाकरण (राइटर्स बिल्डिंग) अभियान के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ था। इस दौरान पुलिस फायरिंग में 13 लोगों की मौत हुई थी। इसी घटना की जांच के लिए 2011 में न्यायिक आयोग का गठन किया गया था, जिसकी रिपोर्ट अब विधानसभा के पटल पर रखी गई है।