मुंबई | भारतीय शेयर बाजार के लिए पिछला एक साल निवेशकों के लिहाज से चुनौतीपूर्ण रहा है। बाजार में कई बार तेजी देखने को मिली, लेकिन वैश्विक तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने तेजी पर ब्रेक लगा दिया। 23 अक्टूबर 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दिवाली से इस दिवाली तक निफ्टी 50 में 10.3% की गिरावट आई है। वहीं, निफ्टी 500 भी 7.8% नीचे रहा।
Nifty Midcap और Smallcap में भी कमजोरी
बाजार की गिरावट केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी कमजोरी दर्ज की गई। आंकड़ों के मुताबिक, निफ्टी मिडकैप 100 में 4.5% और निफ्टी स्मॉलकैप 250 में 3.7% की गिरावट आई है। इस दौरान कई दिग्गज कंपनियों के शेयरों ने निवेशकों को निराश किया। पिछले दिवाली से अब तक 83 लार्जकैप कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। कुछ शेयरों में करीब 60% तक की कमजोरी आई। गिरावट वाले शेयरों में स्विगी, टाटा मोटर्स, एचडीएफसी बैंक, इंफोसिस, आईटीसी, वेदांता, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स और जियो फाइनेंशियल सर्विसेज शामिल हैं।
इन बड़ी कंपनियों के शेयरों में आई तेजी
जहां ज्यादातर लार्जकैप शेयर दबाव में रहे, वहीं कुछ कंपनियों ने बेहतर प्रदर्शन किया। आंकड़ों के अनुसार, केवल 43 लार्जकैप शेयर पिछले दिवाली के मुकाबले बढ़त दर्ज कर पाए। इनमें बीएचईएल, हिताची एनर्जी, एसएएमआईएल, टाइटन, श्रीराम फाइनेंस, हिंडाल्को और अडानी पावर जैसे नाम शामिल हैं। इन कंपनियों के शेयरों में अधिकतम 70% तक की तेजी देखने को मिली।
क्या लार्जकैप शेयरों में निवेश का मौका बन रहा है?
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, पिछले एक साल की गिरावट के बाद कई बड़े शेयरों के वैल्यूएशन पहले के मुकाबले आकर्षक हो गए हैं। कुछ कंपनियों के शेयरों में कारोबार की वास्तविक स्थिति की तुलना में ज्यादा गिरावट आई है। ऐसे में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए चुनिंदा शेयरों में अवसर बन सकता है। आंकड़ों के अनुसार, निफ्टी फिलहाल अगले एक साल की अनुमानित कमाई के मुकाबले 16.4 गुना वैल्यूएशन पर कारोबार कर रहा है। इसका लंबी अवधि का औसत 18.4 गुना है। यानी मौजूदा वैल्यूएशन ऐतिहासिक औसत से नीचे है। हालांकि, कम वैल्यूएशन का मतलब यह नहीं है कि बाजार तुरंत तेजी पकड़ लेगा।
FII की बिकवाली से बड़े शेयरों पर दबाव
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली बाजार के लिए बड़ी चिंता बनी हुई है। सितंबर तिमाही में कम से कम 53 ऐसी कंपनियों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घटी, जिनका बाजार मूल्य एक लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक है। एचडीएफसी बैंक में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 2.43 प्रतिशत अंक कम हुई। इस साल बैंक के शेयर में करीब 30% की गिरावट आई है। इसी तरह आईटीसी में विदेशी हिस्सेदारी 1.01 प्रतिशत अंक और महिंद्रा एंड महिंद्रा में 1.55 प्रतिशत अंक घटी। रिलायंस इंडस्ट्रीज में भी विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 0.52 प्रतिशत अंक कम हुई है। इस साल कंपनी का शेयर करीब 24.2% टूट चुका है। टीसीएस, भारती एयरटेल, मारुति सुजुकी, हिंदुस्तान यूनिलीवर और एचडीएफसी लाइफ इंश्योरेंस जैसी कंपनियों में भी विदेशी हिस्सेदारी और शेयर कीमतों पर दबाव देखा गया।
आगे कैसी रह सकती है शेयर बाजार की चाल?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि गिरावट के बाद चुनिंदा शेयरों में निवेश के अवसर बन सकते हैं, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों में अनिश्चितता अभी बनी हुई है। भारतीय अर्थव्यवस्था को घरेलू मांग, सेवा क्षेत्र, इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकारी खर्च, कर्ज की उपलब्धता और निजी क्षेत्र के निवेश से समर्थन मिल रहा है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अक्टूबर 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7.1% किया है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और कमजोर मानसून से महंगाई बढ़ने, ग्रामीण मांग प्रभावित होने और कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आने का जोखिम बना हुआ है। आने वाले समय में शेयर बाजार की दिशा कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक महंगाई, ब्याज दरों, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और कंपनियों के तिमाही नतीजों पर निर्भर करेगी। ऐसे में निवेशकों के लिए जल्दबाजी में फैसले लेने के बजाय कंपनी के फंडामेंटल, वैल्यूएशन और अपनी जोखिम क्षमता को ध्यान में रखना जरूरी है।