मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में बैकुंठ चतुर्दशी के बाद भगवान महाकाल और भगवान विष्णु का एक साथ भस्म आरती में पूजन किया जाता है। यह परंपरा अनादि काल से चली आ रही है। वैकुंठ चतुर्दशी के अगले दिन भगवान शिव और विष्णु की एक साथ पूजा अर्चना होती है। मंदिर आने वाले भक्तों को शिव और विष्णु का एक साथ आशीर्वाद भी मिलता है।
भगवान शिव भगवान विष्णु को सौंप देते हैं सृष्टि का भार
महाकालेश्वर मंदिर के महेश पुजारी ने बताया कि, वैकुंठ चतुर्दशी को भगवान शिव सृष्टि का भार भगवान विष्णु को सौंप देते हैं। इस दौरान महाकालेश्वर मंदिर से निकलने वाली सवारी गोपाल मंदिर पहुंचती है। यहां पर भगवान शिव और विष्णु की एक साथ पूजा की जाती है। इसके बाद बैकुंठ चतुर्दशी के अगले दिन भगवान शिव और विष्णु की भगवान महाकालेश्वर के दरबार में पूजा अर्चना होती है। रविवार सुबह होने वाली भस्म आरती में भगवान महाकाल के साथ-साथ भगवान विष्णु की भी पूजा अर्चना और आराधना की गई। यह परंपरा पर में केवल एक बार ही निभाई जाती है।क्यों सौंपा जाता है भगवान विष्णु को सृष्टि का भार?
महाकालेश्वर मंदिर के राम पुजारी ने बताया कि, देवउठनी एकादशी को भगवान शिव एक बार फिर सृष्टि का भार भगवान विष्णु को सौंप देते हैं। परंपरा के अनुसार देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु पाताल लोक में चले जाते हैं और इस दौरान सृष्टि का भार भगवान शिव के पास आ जाता है, जबकि देव उठानी एकादशी पर भगवान विष्णु एक बार फिर सृष्टि का भार संभाल लेते हैं, जबकि भगवान शिव कैलाश पर्वत पर चले जाते हैं।भगवान शिव और विष्णु का एक साथ आशीर्वाद
महाकालेश्वर दर्शन करने आए हैदराबाद के रोहताश सिंह ने बताया कि, उन्हें भगवान शिव और विष्णु की एक साथ पूजा अर्चना का विधि विधान पता नहीं था। महाकालेश्वर मंदिर में जब भगवान शिव के साथ विष्णु की पूजा होते देखी तो पूरी जानकारी हासिल की। भगवान महाकाल के दरबार में शिव और विष्णु का एक साथ आशीर्वाद मिलना काफी सौभाग्यशाली रहा है।Read More: उज्जैन में कार्तिक मेला चुनाव आचार संहिता समाप्त होने के बाद लगेगा
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