लखनऊ: उत्तर प्रदेश की 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती का मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। 7 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान BEd अभ्यर्थियों की पात्रता और भर्ती के समय उनकी कानूनी स्थिति को लेकर कई अहम सवाल उठे। मामला खास तौर पर उन करीब 35 हजार BEd अभ्यर्थियों के चयन से जुड़ा है, जिन्होंने भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लिया था और बाद में शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए। सुनवाई के दौरान यह सवाल सामने आया कि जब भर्ती के समय BEd डिग्रीधारकों को पात्र माना गया था, तो बाद में उनकी नियुक्ति पर सवाल कैसे उठाए जा सकते हैं। कोर्ट के सामने यह मुद्दा भी आया कि अधिक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों को केवल प्रशिक्षण योग्यता के आधार पर बाहर करना कितना उचित होगा। हालांकि, सुनवाई में उठाए गए सवालों को सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। भर्ती से जुड़ा विवाद BEd और BTC अभ्यर्थियों की पात्रता के साथ-साथ आरक्षण और चयन सूची की वैधता से भी जुड़ा है। ऐसे में इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई हजारों अभ्यर्थियों और पहले से नियुक्त शिक्षकों के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।
कैसे शुरू हुई 69 हजार शिक्षक भर्ती?
उत्तर प्रदेश में 69 हजार सहायक शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत 4 दिसंबर 2018 को जारी विज्ञापन से हुई थी। राज्य सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने के लिए यह भर्ती निकाली थी। इसके बाद 6 जनवरी 2019 को सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा यानी ATRE आयोजित की गई। परीक्षा में सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम 65 प्रतिशत और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए 60 प्रतिशत अंक निर्धारित किए गए थे। इस परीक्षा में बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया और करीब 1.46 लाख उम्मीदवार सफल घोषित किए गए। वर्ष 2020 में दो चयन सूचियों के माध्यम से कुल 67,867 अभ्यर्थियों का चयन किया गया। हालांकि, चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद भर्ती में आरक्षण के नियमों और अभ्यर्थियों की पात्रता को लेकर विवाद खड़ा हो गया। धीरे-धीरे यह मामला अदालतों तक पहुंच गया और अब सुप्रीम कोर्ट में इस पर कानूनी लड़ाई जारी है।
BEd और BTC अभ्यर्थियों के बीच क्या है विवाद?
69 हजार शिक्षक भर्ती में BEd और BTC डिग्रीधारकों की पात्रता सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बन गई है। भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के समय BEd डिग्रीधारकों को भी आवेदन करने का अवसर दिया गया था। इसके चलते बड़ी संख्या में BEd अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी और चयन प्रक्रिया में सफल होने के बाद शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए। बाद में प्राथमिक स्तर पर शिक्षक बनने के लिए BEd डिग्री की मान्यता को लेकर कानूनी स्थिति में बदलाव आया। इसके बाद BTC और DElEd प्रशिक्षित अभ्यर्थियों की ओर से BEd उम्मीदवारों की पात्रता पर सवाल उठाए गए। उनका तर्क है कि प्राथमिक शिक्षक पद के लिए निर्धारित प्रशिक्षण योग्यता के नियमों का पालन किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, BEd अभ्यर्थियों का कहना है कि जब भर्ती के समय उन्हें पात्र मानकर चयन प्रक्रिया में शामिल किया गया, तो बाद में उनकी नियुक्ति पर सवाल उठाना उचित नहीं है। इसी विरोधाभास के कारण यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा बन गया है।
BEd और BTC में क्या अंतर है?
BEd यानी बैचलर ऑफ एजुकेशन शिक्षक प्रशिक्षण से जुड़ी एक डिग्री है, जबकि BTC प्राथमिक स्तर पर शिक्षकों को प्रशिक्षित करने वाला पाठ्यक्रम रहा है। BTC को अब सामान्य तौर पर DElEd यानी डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन के नाम से जाना जाता है। दोनों पाठ्यक्रमों का उद्देश्य शिक्षण के लिए जरूरी कौशल और प्रशिक्षण प्रदान करना है, लेकिन प्राथमिक शिक्षक पदों के लिए उनकी स्वीकार्यता संबंधित नियमों और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करती है। इसी कारण 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती में दोनों योग्यताओं को लेकर विवाद खड़ा हुआ। BEd अभ्यर्थियों का कहना है कि भर्ती के समय लागू नियमों के आधार पर उन्होंने आवेदन किया और चयन प्राप्त किया था। वहीं, BTC/DElEd अभ्यर्थी प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्ति के लिए निर्धारित प्रशिक्षण मानकों के पालन पर जोर दे रहे हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तय करना महत्वपूर्ण है कि संबंधित नियमों और कानूनी फैसलों का इस भर्ती पर किस तरह प्रभाव पड़ेगा। इस मुद्दे का समाधान भर्ती से जुड़े हजारों अभ्यर्थियों की स्थिति स्पष्ट करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
करीब 35 हजार BEd शिक्षकों की नौकरी पर क्यों फंसा पेच?
7 अक्टूबर 2026 की सुनवाई में करीब 35 हजार BEd अभ्यर्थियों के चयन और उनकी मौजूदा नियुक्तियों से जुड़ा मुद्दा चर्चा में रहा। इन अभ्यर्थियों की चिंता यह है कि भर्ती के समय पात्र माने जाने के बावजूद उनकी नौकरी पर बाद में सवाल उठाए जा रहे हैं। सुनवाई के दौरान यह सवाल सामने आया कि यदि BEd उम्मीदवार निर्धारित प्रक्रिया के तहत चयनित हुए थे, तो उनकी नियुक्ति रद्द करने का आधार क्या होगा। कोर्ट के सामने यह पहलू भी आया कि यदि किसी BEd अभ्यर्थी के अंक किसी BTC अभ्यर्थी से अधिक हैं, तो केवल प्रशिक्षण योग्यता के आधार पर उसे बाहर करने की वैधता पर विचार करना होगा। हालांकि, किसी उम्मीदवार के अधिक अंक होने से उसकी नियुक्ति का अधिकार अपने आप तय नहीं हो जाता। पात्रता के नियम और भर्ती के समय लागू कानूनी प्रावधान भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इस मामले में अंतिम निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट के फैसले और संबंधित नियमों की व्याख्या पर निर्भर करेगा। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि करीब 35 हजार BEd शिक्षकों की नौकरी जाएगी या उनकी नियुक्तियां सुरक्षित रहेंगी।
आरक्षण का विवाद भी बना हुआ है अहम मुद्दा
69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती का विवाद केवल BEd और BTC अभ्यर्थियों की शैक्षणिक योग्यता तक सीमित नहीं है। इस भर्ती में आरक्षण के नियमों के पालन को लेकर भी लंबे समय से सवाल उठाए जाते रहे हैं। कुछ अभ्यर्थियों ने चयन सूची तैयार करने के तरीके और आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को दिए गए लाभों पर आपत्ति जताई थी। इन शिकायतों के बाद मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ तक पहुंचा। 13 अगस्त 2024 को हाई कोर्ट ने भर्ती की चयन सूची को रद्द करते हुए नियमों के अनुसार नई सूची तैयार करने का निर्देश दिया था। इस आदेश के बाद भर्ती प्रक्रिया और पहले से नियुक्त शिक्षकों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां चयन सूची, आरक्षण और नियुक्तियों से संबंधित मुद्दों पर विचार किया जा रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट के आदेश और भर्ती से जुड़े विभिन्न पक्षों की दलीलों पर क्या रुख अपनाता है।
जुलाई 2026 में यूपी सरकार ने क्या कहा था?
जुलाई 2026 में उत्तर प्रदेश सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के सामने पहले से नियुक्त शिक्षकों के भविष्य को लेकर अपना पक्ष रखा था। सरकार ने कहा था कि 69 हजार शिक्षक भर्ती के तहत पहले से नियुक्त 67,867 शिक्षकों की नौकरी सुरक्षित रखी जानी चाहिए। सरकार के पक्ष के अनुसार, संशोधित मेरिट सूची तैयार होने पर यदि नए पात्र अभ्यर्थी सामने आते हैं, तो उन्हें उपलब्ध रिक्त पदों पर समायोजित करने के विकल्प पर विचार किया जा सकता है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य भर्ती विवाद के समाधान के साथ पहले से काम कर रहे शिक्षकों की स्थिति को भी ध्यान में रखना है। हालांकि, सरकार की ओर से रखे गए पक्ष को अदालत के अंतिम आदेश के बराबर नहीं माना जा सकता। इस मामले में नियुक्त शिक्षकों, नए पात्र अभ्यर्थियों और आरक्षण से जुड़े दावों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तय करना महत्वपूर्ण होगा कि कानूनी नियमों का पालन करते हुए किस तरह समाधान निकाला जा सकता है। इसलिए सरकार की दलील और अदालत के अंतिम निर्णय के बीच अंतर समझना जरूरी है।
अभी क्या है 69 हजार शिक्षक भर्ती मामले की स्थिति?
फिलहाल 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आया है। ऐसे में करीब 35 हजार BEd शिक्षकों की नौकरी जाने या सुरक्षित रहने को लेकर अभी कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। मामले में BEd और BTC/DElEd अभ्यर्थियों की पात्रता, आरक्षण के नियमों और चयन सूची की वैधता जैसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया जाना है। अदालत को यह भी देखना होगा कि भर्ती के समय लागू नियमों और बाद में आए कानूनी बदलावों का पहले से नियुक्त शिक्षकों पर क्या प्रभाव पड़ता है। दूसरी ओर, भर्ती में शामिल अन्य अभ्यर्थी भी अपने अधिकारों और चयन प्रक्रिया में निष्पक्षता को लेकर फैसले का इंतजार कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने पहले से नियुक्त शिक्षकों की नौकरी सुरक्षित रखने और नए पात्र अभ्यर्थियों को रिक्त पदों पर समायोजित करने का पक्ष रखा था। अब आगे की सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश इस लंबे विवाद की दिशा तय करेगा। तब तक अभ्यर्थियों और शिक्षकों को किसी भी अपुष्ट दावे के आधार पर नौकरी जाने या नियुक्ति मिलने का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।