भुवनेश्वर. किसी कलाकार की पहचान केवल उसकी जन्मभूमि से नहीं होती। उसकी असली पहचान उस संस्कृति से बनती है जिसे वह अपनी साधना के माध्यम से आत्मसात कर लेता है। शेरॉन लोवेन इसका असाधारण उदाहरण हैं। अमेरिका के डेट्रॉयट में जन्मी इस कलाकार ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य को केवल सीखा नहीं उसे अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया। पांच दशकों से अधिक समय से भारत में रहकर ओडिसी मणिपुरी और छऊ जैसी भारतीय नृत्य परंपराओं की साधना कर रहीं शेरॉन लोवेन आज भारतीय नृत्य-जगत में ऐसा नाम हैं जिसके आगे विदेशी कलाकार का विशेषण अप्रासंगिक हो जाता है। उनकी यात्रा संस्कृति के प्रति समर्पण की मिसाल है।
गुरु केलुचरण महापात्र पुरस्कार से सम्मान
गुरु केलुचरण महापात्र की जन्मशती के अवसर पर सृजन द्वारा प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी भुवनेश्वर में आयोजित समारोह में शेरॉन लोवेन को गुरु केलुचरण महापात्र पुरस्कार से सम्मानित किया जाना उनकी दीर्घ साधना की स्वाभाविक परिणति है। नृत्य के क्षेत्र में उनके विशिष्ट और आजीवन योगदान के लिए उन्हें एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि और प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया। लेकिन इस सम्मान का अर्थ केवल एक वरिष्ठ नृत्यांगना को मिला पुरस्कार नहीं है। इसके भीतर एक गुरु की उस शिष्या के प्रति स्वीकृति भी निहित है जिसने गुरु से मिली परंपरा को अपनी पूरी निष्ठा के साथ जीवन भर आगे बढ़ाया। यह सम्मान परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है।
भारत आने से ओडिसी तक का सफर
1973 में फुलब्राइट छात्रवृत्ति पर भारत आने वाली शेरॉन के लिए भारत आरंभ में अध्ययन और जिज्ञासा का देश था। उन्होंने मानविकी ललित कला और एशियाई अध्ययन के साथ नृत्य की विभिन्न विधाओं का अध्ययन किया था। पश्चिमी नृत्य आधुनिक नृत्य मूकाभिनय और रंगमंच से उनका परिचय था। भारत आने के बाद उन्होंने मणिपुरी नृत्य का अध्ययन आरंभ किया। बाद में मयूरभंज छऊ और फिर ओडिसी उनके जीवन की निर्णायक यात्राएं बन गईं। 1975 में उनका परिचय गुरु केलुचरण महापात्र से हुआ। यही वह क्षण था जिसने उनके जीवन और कला की दिशा बदल दी। गुरु केलुचरण महापात्र ने उनकी प्रतिभा को आरंभ में ही पहचान लिया।
गुरु-शिष्य परंपरा का आधुनिक उदाहरण
शेरॉन के पूर्व नृत्य-प्रशिक्षण ने उन्हें ओडिसी की जटिल देह-भाषा लय और संरचना को समझने में सहायता दी लेकिन गुरुजी के मार्गदर्शन ने उस प्रारंभिक दक्षता को भारतीय नृत्य की आत्मा से जोड़ा। उन्होंने गुरु से मंगलाचरण बटु नृत्य पल्लवी और अभिनय की बारीकियां सीखीं। यह सीखना केवल नृत्य की मुद्राओं और गतियों को याद करना नहीं था। भारतीय शास्त्रीय नृत्य में शरीर के साथ मन भाव साहित्य संगीत और अध्यात्म भी साधना का हिस्सा हैं। शेरॉन ने इसी व्यापक अर्थ में ओडिसी को ग्रहण किया। गुरु केलुचरण महापात्र और शेरॉन लोवेन का संबंध भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा के आधुनिक उदाहरणों में विशेष स्थान रखता है। गुरुजी ने उन्हें केवल एक प्रतिभाशाली विदेशी विद्यार्थी के रूप में नहीं देखा। उन्होंने उनकी जिज्ञासा अनुशासन और सीखने की क्षमता को पहचाना और उन्हें अपनी परंपरा के भीतर स्थान दिया।
गुरु की स्वीकृति और परंपरा की साधना
1980 के दशक में जब गुरुजी उनके साथ अमेरिका में प्रस्तुतियों के लिए गए तब तक शेरॉन उनकी प्रमुख शिष्याओं में शामिल हो चुकी थीं। उस यात्रा के बाद गुरु केलुचरण महापात्र ने उनके बारे में कहा था कि वह अब मेरी पांच श्रेष्ठतम शिष्याओं में से एक हैं जिनकी मैं दुनिया में कहीं भी ओडिसी नृत्य शैली का प्रतिनिधित्व करने के लिए बिना किसी संकोच के अनुशंसा कर सकता हूं। शेरॉन ने इस परंपरा को पूरी तरह साध लिया है। किसी गुरु की अपनी शिष्या के लिए इससे बड़ी स्वीकृति और क्या हो सकती है। परंपरा को साध लेना केवल तकनीकी दक्षता का प्रमाण नहीं है। इसका अर्थ है उस परंपरा की भाषा उसकी लय उसके सौंदर्यबोध और उसके अंतर्निहित दर्शन को समझ लेना। शेरॉन अपने गुरु को याद करते हुए कहती हैं कि उन्होंने उन्हें ओड़िया जीवन-पद्धति को समझने और ओडिशा तथा भगवान जगन्नाथ की संस्कृति से प्रेम करने के लिए प्रेरित किया। गुरुजी के नृत्य के प्रति जुनून ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। यही कारण है कि शेरॉन की ओडिसी केवल किसी विदेशी कलाकार द्वारा प्रस्तुत की गई भारतीय नृत्य शैली नहीं रह गई। उसमें उस संस्कृति के प्रति आत्मीयता दिखाई देती है जिसे उन्होंने वर्षों की साधना से समझा। उनकी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि किसी संस्कृति को अपनाने के लिए जन्म से उस संस्कृति का हिस्सा होना आवश्यक नहीं। उसके प्रति सम्मान धैर्य अनुशासन और समर्पण कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।