मुम्बई. किसी कलाकार की महानता को समझने के लिए उसके पुरस्कारों से पहले उसके संघर्ष को समझना जरूरी होता है। नाना पाटेकर की कहानी इसी अर्थ में असाधारण थी। किशोरावस्था में ही परिवार की आर्थिक कठिनाइयों ने उन्हें काम करने के लिए मजबूर कर दिया था। उन्होंने लगभग 13 वर्ष की उम्र में फिल्मी पोस्टर बनाने का काम किया और उस समय करीब 35 रुपये महीने कमाते थे। काम तक पहुंचने के लिए उन्हें प्रतिदिन लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती थी और कई बार एक समय के भोजन के सहारे दिन गुजारना पड़ता था। बाद में उन्होंने अपने जीवन के उन दिनों को भूख और अपमान का ऐसा विद्यालय माना जिसने उन्हें भीतर से मजबूत बनाया। सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट और एप्लाइड आर्ट की शिक्षा ने उनकी कलात्मक दृष्टि को आकार दिया और रंगमंच ने उस दृष्टि को अभिनय की भाषा दी। 1978 में गमन से फिल्मी यात्रा शुरू हुई लेकिन वास्तविक पहचान तक पहुंचने में वर्षों का संघर्ष लगा।
रंगमंच की तपस्या से बनी अभिनय शैली
नाना पाटेकर की अभिनय-शैली को केवल फिल्मी अभिनय कह देना उसके मूल स्रोत को नजरअंदाज करना होगा। उनका वास्तविक संस्कार रंगमंच से आया था। विजय तेंदुलकर और मराठी रंगमंच की गंभीर नाट्य परंपरा से जुड़कर उन्होंने अभिनय को बाहरी प्रदर्शन के बजाय आंतरिक अनुभव बनाया। उनके अभिनय में वह मंचीय अनुशासन दिखाई देता था जिसमें संवाद केवल शब्द नहीं रहता बल्कि चरित्र की मानसिक अवस्था का विस्फोट बन जाता है। कैमरे के सामने आते ही उनका चेहरा आवाज शरीर और मौन सब अभिनय का हिस्सा बन जाते थे। यही कारण था कि उनकी हर भूमिका में रंगमंच की गहनता झलकती थी और दर्शक उन्हें केवल अभिनेता नहीं बल्कि जीता-जागता चरित्र महसूस करते थे।
परिंदा से क्रांतिवीर तक बदली नायक की परिभाषा
नाना पाटेकर ने हिंदी सिनेमा में परंपरागत नायक की चमक-दमक से अलग अपनी जगह बनाई। परिंदा में उनका संसार हिंसा अपराध और मनुष्य की टूटती हुई संवेदनाओं से बना था। अंगार तिरंगा क्रांतिवीर अग्निसाक्षी और खामोशी द म्यूजिकल जैसी फिल्मों ने साबित किया कि चरित्र अभिनेता भी पूरी फिल्म की आत्मा बन सकता है। क्रांतिवीर उनके करियर का ऐसा पड़ाव बना जहां उनका आक्रोश संवेदनशीलता संवाद-अदायगी और सामाजिक चेतना एक साथ दिखाई दी। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। उनकी संवाद-अदायगी इतनी स्वाभाविक और तीव्र थी कि कई दृश्यों में ऐसा लगता था जैसे अभिनेता संवाद नहीं बोल रहा बल्कि चरित्र स्वयं अपनी पीड़ा और क्रोध व्यक्त कर रहा हो।
हर रंग में अपना संसार रचने वाला कलाकार
नाना पाटेकर को किसी एक खांचे में बांधना लगभग असंभव था। वे खलनायक बने तो भय पैदा किया पुलिस अधिकारी बने तो कठोरता के भीतर मनुष्य को दिखाया राजनीतिक चरित्र निभाया तो सत्ता की जटिलता सामने रख दी और संवेदनशील व्यक्ति बने तो दर्शकों को भीतर तक छू लिया। अब तक छप्पन के पुलिस अधिकारी से लेकर राजनीति के राजनीतिक चरित्र और नटसम्राट के वृद्ध रंगकर्मी तक उनका अभिनय लगातार नए रूप ग्रहण करता रहा। वेलकम में उदय शेट्टी बनकर उन्होंने यह भी सिद्ध कर दिया कि जिस अभिनेता की पहचान तीव्र और गंभीर भूमिकाओं से बनी हो वह हास्य के क्षेत्र में भी उतना ही प्रभावशाली हो सकता है। उदय शेट्टी का क्रोध असुरक्षा भाईचारा और हास्य आज भी लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा है।
नटसम्राट में अभिनेता और चरित्र एक हो गए
यदि नाना पाटेकर के समूचे अभिनय जीवन से कुछ चुनिंदा भूमिकाएं अलग करनी हों तो नटसम्राट उनमें सबसे ऊपर होगी। आप्पासाहेब बेलवलकर के रूप में उन्होंने केवल एक वृद्ध रंगकर्मी की भूमिका नहीं निभाई बल्कि उस कलाकार की त्रासदी को जीया जिसने पूरी जिंदगी मंच को दिया और अंत में जीवन के मंच पर ही अकेला पड़ गया। इस भूमिका में उनकी आवाज में कभी रंगमंच का गर्व था कभी टूटते मनुष्य की विवशता और कभी उस कलाकार की पीड़ा जिसे लगता है कि उसकी पूरी दुनिया उससे छीन ली गई है। नटसम्राट ने यह भी सिद्ध किया कि नाना पाटेकर का सबसे बड़ा हथियार उनका चेहरा या उनका प्रसिद्ध भारी स्वर नहीं बल्कि भावनाओं को भीतर तक पकड़ लेने की क्षमता थी। यह भूमिका उनके करियर की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिनी जाएगी।
निर्देशक सैनिक और सामाजिक संवेदना का चेहरा
नाना पाटेकर का व्यक्तित्व कैमरे के बाहर भी उतना ही बहुआयामी था। प्रहार द फाइनल अटैक के माध्यम से उन्होंने निर्देशन लेखन और अभिनय को एक साथ साधा तथा भारतीय सैनिक के जीवन और अनुशासन के प्रति अपनी गहरी रुचि दिखाई। सेना से उनका संबंध केवल पर्दे तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण लिया और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान सैनिकों के साथ समय बिताया। उनका यह पक्ष उन्हें सामान्य फिल्मी सितारों से अलग करता है। किसानों और सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए नाम फाउंडेशन के माध्यम से किया गया काम उनके सार्वजनिक जीवन की दूसरी महत्वपूर्ण पहचान बना। तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार फिल्मफेयर सहित अनेक सम्मान और 2013 में पद्मश्री उनके योगदान का सांख्यिकीय परिचय देते हैं लेकिन उनका वास्तविक योगदान इससे कहीं बड़ा है। उन्होंने भारतीय सिनेमा को यह विश्वास दिया कि अभिनेता को सुंदर चेहरा या स्टार परिवार की पृष्ठभूमि की आवश्यकता नहीं होती। अनुभव संवेदना आवाज और चरित्र को समझने की क्षमता हो तो वह अकेला भी पर्दे पर पूरी दुनिया खड़ी कर सकता है। नाना पाटेकर चले गए पर क्रांतिवीर का आक्रोश नटसम्राट की करुणा परिंदा की बेचैनी और वेलकम की खिलखिलाती विडंबना आने वाली पीढ़ियों के सामने उनकी उपस्थिति दर्ज कराती रहेगी।