रविवार को अफगानिस्तान में 4.1 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया, जिसकी गहराई मात्र 10 किलोमीटर थी। उथली गहराई के कारण इस भूकंप ने आफ्टरशॉक्स और संभावित नुकसान की आशंका बढ़ा दी। नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के अनुसार, इसका केंद्र 33.74° उत्तरी अक्षांश और 65.70° पूर्वी देशांतर पर स्थित था। इससे पहले भी 14 और 15 जनवरी को यहां क्रमशः 3.8 और 4.2 तीव्रता के भूकंप दर्ज किए जा चुके हैं, जो इस क्षेत्र की लगातार सक्रियता को दर्शाते हैं।
हिंदूकुश क्षेत्र: भूकंपों का स्थायी केंद्र
अफगानिस्तान का हिंदूकुश क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। यह क्षेत्र भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों की टकराहट की सीमा पर स्थित है, जहां ऊर्जा का निरंतर संचय और विमोचन होता रहता है। रेड क्रॉस के अनुसार, इसी भूगर्भीय संरचना के कारण अफगानिस्तान बार-बार विनाशकारी भूकंपों का सामना करता रहा है, जिससे जनजीवन और संसाधन दोनों प्रभावित होते हैं।
कमजोर बुनियादी ढांचा और मानवीय संकट
UNOCHA ने चेतावनी दी है कि दशकों से चले आ रहे संघर्षों, आर्थिक अस्थिरता और कमजोर बुनियादी ढांचे के कारण अफगानिस्तान प्राकृतिक आपदाओं के प्रति बेहद संवेदनशील बना हुआ है। भूकंप जैसी आपदाएं यहां केवल भौतिक क्षति तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि भोजन, स्वास्थ्य और आवास संकट को भी गंभीर बना देती हैं।
म्यांमार में लगातार झटके: सागाइंग फॉल्ट की चुनौती
अफगानिस्तान के समान ही म्यांमार में भी रविवार को 3.5 तीव्रता का भूकंप आया, जिसकी गहराई 65 किलोमीटर थी। इससे पहले 15 जनवरी को 3.3 और 4.8 तीव्रता के भूकंप दर्ज किए गए, जिनमें से 4.8 तीव्रता वाला भूकंप मात्र 10 किलोमीटर की गहराई पर था। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे उथले भूकंप अधिक खतरनाक होते हैं क्योंकि उनकी तरंगें सीधे धरती की सतह तक पहुंचकर अधिक तबाही मचाती हैं।
चार टेक्टोनिक प्लेटों का संगम और शहरी खतरा
म्यांमार भारतीय, यूरेशियन, सुंडा और बर्मा—चार टेक्टोनिक प्लेटों के संगम पर स्थित है। यहां से गुजरने वाला लगभग 1,400 किलोमीटर लंबा सागाइंग फॉल्ट देश के प्रमुख शहरों सागाइंग, मांडले, बागो और यांगून के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है। इन क्षेत्रों में देश की लगभग 46 प्रतिशत आबादी निवास करती है, जिससे किसी बड़े भूकंप की स्थिति में मानवीय क्षति का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
भूकंप के बाद स्वास्थ्य संकट की आशंका
विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही चेतावनी दे चुका है कि बड़े भूकंपों के बाद विस्थापित आबादी में टीबी, एचआईवी और जलजनित बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ता है। अस्थायी शिविरों, स्वच्छ पानी की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव के कारण यह संकट और भी गंभीर रूप ले सकता है।
भूकंपीय चेतावनी और क्षेत्रीय सतर्कता की जरूरत
अफगानिस्तान और म्यांमार में आए ये भूकंप केवल स्थानीय घटनाएं नहीं हैं, बल्कि पूरे एशियाई क्षेत्र के लिए चेतावनी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर भूकंप निगरानी, मजबूत बुनियादी ढांचा और आपदा प्रबंधन की तैयारी ही ऐसे झटकों से होने वाले नुकसान को कम कर सकती है। प्रकृति के संकेतों को अनदेखा करना भविष्य में और बड़े संकट को जन्म दे सकता है।
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