कोलकाता डेस्क: अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से जारी सैन्य तनाव के बीच एक बार फिर कूटनीतिक कोशिश को झटका लगा है। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की ओर से रखे गए 7 दिवसीय युद्धविराम प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है। इस प्रस्ताव में सात दिनों के भीतर रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और व्यापक शांति वार्ता शुरू करने की बात कही गई थी। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से आई रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान पर फिर से हवाई हमले शुरू करने की उम्मीद भी जताई है।
ईरान ने क्या रखा था 7 दिन का प्लान?
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान बताया था कि तेहरान ने मध्यस्थों के जरिए अमेरिका के सामने एक प्रस्ताव रखा है। इसके तहत अमेरिका की ओर से सैन्य दबाव कम किए जाने और कुछ शर्तें पूरी होने के बाद सात दिनों की समयसीमा में होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने की बात कही गई थी। ईरान का कहना है कि इसके बाद व्यापक शांति वार्ता को आगे बढ़ाया जा सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले तेल और गैस के बड़े हिस्से की आवाजाही इसी रास्ते से होती है। ऐसे में यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार, तेल की कीमतों और वैश्विक सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है। हाल के तनाव के बीच इस मार्ग को लेकर अनिश्चितता ने ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ाया है।
ईरान की शर्तों में क्या शामिल है?
ईरान की ओर से रखे गए प्रस्ताव का केंद्र केवल जलडमरूमध्य को खोलना नहीं है। रिपोर्टों के मुताबिक, तेहरान चाहता है कि अमेरिका सैन्य दबाव और बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी को कम करे तथा ईरान पर लगे तेल प्रतिबंधों में राहत दे। इसके साथ ही जमे हुए ईरानी परिसंपत्तियों को लेकर भी चर्चा प्रस्ताव का हिस्सा बताई गई है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में प्रस्ताव की सभी वित्तीय शर्तों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इन दावों को ईरानी पक्ष की शर्तों के तौर पर देखना उचित है।
कतर की मध्यस्थता से हुई बातचीत
अमेरिका और ईरान के बीच सीधे संबंधों के बजाय मध्यस्थों के जरिए संपर्क जारी है। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान कतर ने दोनों पक्षों के बीच संदेश पहुंचाने में भूमिका निभाई। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची और अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ के बीच भी कतर की मध्यस्थता से बातचीत हुई। ईरानी पक्ष ने इसे सकारात्मक बताया, हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसे किसी बड़े कूटनीतिक ब्रेकथ्रू के रूप में पेश करने से सावधानी बरती।
ट्रंप ने प्रस्ताव क्यों ठुकराया?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन और ईरान के बीच सबसे बड़ी असहमति इस बात को लेकर है कि बातचीत किस क्रम में आगे बढ़े। ईरान पहले सैन्य दबाव कम करने, होर्मुज को खोलने और प्रतिबंधों में राहत चाहता है, जबकि अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को वार्ता के प्रमुख मुद्दों में शामिल करना चाहता है। इसी मतभेद के कारण दोनों देशों के बीच किसी व्यापक समझौते तक पहुंचना अभी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
नवंबर के मिडटर्म चुनाव के बाद क्या होगा?
ट्रंप के अगले कदम को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। Reuters ने वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक ट्रंप ने अपने सहयोगियों से कहा है कि वह नवंबर में होने वाले कांग्रेस के मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान पर बमबारी फिर शुरू करने की उम्मीद करते हैं। यह एक रिपोर्टेड आकलन है, न कि भविष्य की सैन्य कार्रवाई की निश्चित घोषणा। ट्रंप ने इससे पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी कहा था कि समझौता नहीं होने की स्थिति में ईरान के खिलाफ कड़ा सैन्य विकल्प उनके सामने मौजूद है।
तेल और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर?
अमेरिका-ईरान तनाव का सबसे बड़ा आर्थिक असर ऊर्जा बाजार पर दिखाई दे सकता है। होर्मुज में जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रहने पर तेल और गैस की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। हाल में ईरान की ओर से जलडमरूमध्य को सात दिनों के भीतर खोलने की पेशकश की खबर आने के बाद तेल कीमतों में गिरावट भी दर्ज की गई थी, जिससे यह साफ होता है कि बाजार इस समुद्री मार्ग से जुड़ी खबरों पर कितनी तेजी से प्रतिक्रिया कर रहा है।
आगे क्या है सबसे बड़ा सवाल?
फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन दोनों पक्षों की प्राथमिकताओं में अंतर बना हुआ है। ईरान होर्मुज, प्रतिबंधों और सैन्य दबाव को प्रमुख मुद्दा बना रहा है, जबकि अमेरिका परमाणु कार्यक्रम समेत व्यापक सुरक्षा मुद्दों पर बातचीत चाहता है। ऐसे में आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयास आगे बढ़ते हैं या फिर सैन्य तनाव दोबारा तेज होता है, इस पर दुनिया की नजर बनी हुई है।