युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं ने एक ऐसे कल्चर की चमक पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसे देखकर भारत का GenZ दीवाना हो रहा है। सियोल की गलियों की चमकदार तस्वीरें मानसिक अंधेरों को नहीं दिखातीं।
कोरियन आकर्षण में डूबता भारतीय GenZ
भारत के बच्चों और किशोरों में कोरियन म्यूजिक, फैशन, लाइफस्टाइल और ड्रामा का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। मोबाइल स्क्रीन पर दिखने वाली चमक, ग्लैमर और हाई-एनर्जी पॉप कल्चर उन्हें ऐसा एहसास कराता है कि कोरियन स्टाइल ही असली आधुनिकता का पैमाना है। यह आकर्षण केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि जीवनशैली और सोच पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। बच्चों को लगता है कि जिस तरह का जीवन वे मोबाइल पर देखते हैं, वही आदर्श और परफेक्ट है, जबकि वास्तविकता उससे बिलकुल विपरीत है। इस भ्रम ने कई बच्चों को आभासी दुनिया में इतना उलझा दिया कि वे सच्चाई से दूर होते गए और भावनात्मक रूप से कमजोर पड़ने लगे।
गाजियाबाद का दिल दहला देने वाला ट्रिपल सुसाइड केस
एक सर्द रात अचानक तीन मासूम बेटियों के एक साथ अपने जीवन को खत्म कर लेने की घटना ने पूरे देश को हिला दिया। गेमिंग की लत, मानसिक दबाव और बाहरी चमक वाली दुनिया के आकर्षण ने बच्चों को इस हद तक धकेल दिया कि उन्होंने मौत को ही रास्ता समझ लिया। यह हादसा केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। यह पहली बार नहीं है जब किसी ट्रेंड या गेम के प्रभाव में आकर बच्चों ने ऐसा कदम उठाया हो। पहले भी ब्लू व्हेल जैसे गेम्स ने अनेक जिंदगियाँ छीन ली थीं, और इस बार कोरियन कल्चर के अंधे आकर्षण ने अपना खतरनाक रूप दिखाया।
दक्षिण कोरिया: चमकदार संस्कृति के पीछे गहरे मानसिक अंधेरे
जिस देश का कल्चर भारतीय युवाओं को खींच रहा है, वहीं जीवन खत्म करने की घटनाएँ चिंताजनक रूप से अधिक हैं। दक्षिण कोरिया में आत्महत्या की दर भारत की तुलना में लगभग दोगुनी है। यहाँ युवाओं में आत्महत्या का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है और सबसे अधिक प्रभावित वही वर्ग है जो बाहर से सबसे आधुनिक और सफल दिखता है। पढ़ाई का अत्यधिक दबाव, प्रतिस्पर्धा, सामाजिक अपेक्षाओं का बोझ और भावनात्मक थकान युवाओं को भीतर से तोड़ देती है। कोरिया में 2021 में लगभग 10.7% युवाओं ने जीवन में कभी न कभी आत्महत्या का प्रयास किया, जिनमें लड़कियों का अनुपात और भी अधिक रहा। यह बताता है कि बाहरी चकाचौंध के बावजूद मन का अंधकार कितना गहरा है।
मानसिक स्वास्थ्य की गिरावट और दिमागी विकारों की अनदेखी
कोरिया में जिन युवाओं ने आत्महत्या का प्रयास किया, उनमें से 83% किसी न किसी मानसिक विकार से पीड़ित थे, लेकिन दुखद यह है कि केवल 7% ने ही इलाज की ओर कदम बढ़ाया। तनाव, अवसाद और अकेलेपन के कारण युवा भीतर ही भीतर टूटते जाते हैं और मदद लेने से हिचकिचाते हैं। 10 से 14 वर्ष की किशोरियों में आत्महत्या की दर पिछले कुछ वर्षों में लगभग तीन गुना तक बढ़ चुकी है। यह आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर गहराई से जड़ें जमा चुकी है।
दुनिया भर में बढ़ती आत्महत्याओं और भारत की स्थिति
हर साल दुनिया में लगभग 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं, यानी हर 40 सेकंड में एक जिंदगी खत्म हो जाती है। दक्षिण कोरिया दुनिया में आत्महत्या दर के मामले में शीर्ष देशों में है, जहाँ शिक्षा व्यवस्था का दबाव, मानसिक स्वास्थ्य की कमजोरी और सामाजिक प्रतिस्पर्धा प्रमुख कारण माने जाते हैं। भारत इस सूची में 41 से 49वें स्थान के बीच है, लेकिन युवाओं में मानसिक तनाव तेजी से बढ़ रहा है और यह एक गंभीर चेतावनी है। जिस कोरियन संस्कृति को हमारा GenZ जीवन का आदर्श मानता है, उसी देश में सबसे ज्यादा युवा जीवन से हार मान रहे हैं। इस तुलना ने हमारी आँखें खोलनी चाहिए कि आकर्षण हमेशा वास्तविकता नहीं होता।
समाज और परिवार को चेतावनी—क्या छूट रहा है हाथ?
बच्चों की भावनात्मक दुनिया अब स्क्रीन पर निर्भर हो गई है, जिसमें असली रिश्ते, बातचीत, साझा समस्याएं और समर्थन की जगह वर्चुअल लाइफ ने ले ली है। कोरियन कल्चर, गेमिंग और सोशल मीडिया ने बच्चों को ऐसी आदतों में उलझा दिया है, जिसमें वे खुद को अकेला और दबाव में महसूस करते हैं। परिवारों के लिए यह समय बच्चों के भीतर झांकने, उनसे बातचीत करने और उनकी भावनाओं को समझने का है। आधुनिकता का आकर्षण गलत नहीं, पर उसकी अंधी नकल खतरनाक है। यह संतुलन न बना तो न जाने कितनी और जिंदगियाँ इस चकाचौंध के पीछे खो जाएँ।
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