दूसरों से लगातार अपनी तुलना करना मन और मस्तिष्क को अत्यधिक थका देता है। यह तथाकथित कम्पेरिजन फटीग धीरे-धीरे मानसिक सुकून को खत्म कर देती है, क्योंकि व्यक्ति स्वयं को बार-बार कमतर साबित करने लगता है। सोशल मीडिया के दौर में यह स्थिति और गंभीर हो जाती है, जहाँ हर तस्वीर सफलता, विलासिता या खुशी का भ्रम पैदा करती है। ऐसे माहौल में व्यक्ति अपना वास्तविक मूल्य पहचानने में असफल होता है और निरंतर तनाव, उदासी तथा चिंता का शिकार होने लगता है।
बचपन की समाजीकृत तुलना और उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव
भारतीय परिवारों में तुलना को एक सामान्य व्यवहार माना गया है, जहाँ शिक्षा, अंक, करियर और व्यवहार को लेकर बच्चों की तुलना भाई, बहन, रिश्तेदार या पड़ोसियों से की जाती है। यह आदत धीरे-धीरे एक मानसिक ढांचे का निर्माण करती है, जिसमें व्यक्ति अपने हर कदम को दूसरों की सफलता के पैमाने पर मापने लगता है। इसके कारण आत्मविश्वास में कमी, असुरक्षा की भावना और हीनभावना विकसित हो जाती है, जो आगे चलकर मनोवैज्ञानिक तनाव में बदल जाती है।
सोशल मीडिया की चमक और वास्तविकता का टकराव
आज सोशल मीडिया वह मंच बन चुका है जहाँ तुलना अपने चरम पर है। लोग दूसरों की उपलब्धियों को देखकर स्वयं को असफल या पीछे हुआ महसूस करने लगते हैं, जबकि वे यह समझ नहीं पाते कि डिजिटल दुनिया में दिखने वाली अधिकतर चीज़ें केवल चयनित और खूबसूरत झलक होती हैं। यह भ्रम वास्तविकता से टकराकर मन में घर्षण पैदा करता है और व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को लगातार नुकसान पहुँचाता है।
आत्मसम्मान और भावनात्मक संतुलन पर पड़ने वाला प्रभाव
जब व्यक्ति बार-बार दूसरों से अपनी तुलना करता है, तो वह स्वयं को पर्याप्त नहीं मानता। यह आदत आत्मसम्मान को कमजोर कर देती है और भावनात्मक संतुलन को बिगाड़ देती है। धीरे-धीरे व्यक्ति अपने निर्णयों, क्षमताओं और उपलब्धियों पर सवाल उठाने लगता है, जिससे अवसाद, चिंता और रिश्तों में खटास जैसी समस्याएँ सामने आती हैं। तुलना का यह चक्र व्यक्ति को निष्क्रिय, असहाय और असंतुष्ट बना देता है।
अपनी सफलता के पैमाने खुद तय करें
मानसिक शांति बनाए रखने का सबसे सरल उपाय यह है कि व्यक्ति अपनी सफलता, प्रगति और संतोष के मापदंड स्वयं तय करे। हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ, क्षमताएँ और यात्रा अलग होती है, इसलिए तुलना करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं। आत्म-विकास पर ध्यान केंद्रित करके व्यक्ति न केवल मानसिक रूप से मजबूत होता है, बल्कि जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण भी विकसित करता है। स्वयं को स्वीकार करना और अपनी गति से आगे बढ़ना ही सच्ची मानसिक स्वतंत्रता का मार्ग है।
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