मध्य प्रदेश के दतिया जिले का ऐतिहासिक कस्बा भांडेर एक बार फिर गंगा-जमुनी संस्कृति और सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया है। मोहर्रम के अवसर पर निकाले गए ताजियों के पारंपरिक जुलूस ने चतुर्भुज नारायण मंदिर के सामने रुककर श्रद्धापूर्वक सलामी दी। इसके उत्तर में मंदिर के पुजारियों ने सभी ताजियों का सम्मानपूर्वक स्वागत करते हुए पुष्पमालाएं अर्पित कीं। यह दृश्य केवल धार्मिक परंपरा का निर्वहन नहीं था, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच परस्पर सम्मान, विश्वास और सौहार्द की उस विरासत का प्रतीक था, जिसने वर्षों से इस क्षेत्र की सामाजिक पहचान को मजबूत बनाया है। स्थानीय नागरिकों ने भी इस परंपरा को उत्साहपूर्वक देखा और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायी बताया।
दो सौ वर्षों से बिना रुके निभाई जा रही है अनूठी परंपरा
भांडेर करबला समिति के अनुसार यह परंपरा लगभग दो शताब्दियों से लगातार निभाई जा रही है। इस वर्ष मोहर्रम के जुलूस में कुल 37 ताजिए शामिल हुए, जिनमें पांच बड़े और विशेष रूप से आकर्षक ताजिए भी थे। करबला की ओर प्रस्थान करने से पहले सभी ताजिए नियमानुसार चतुर्भुज नारायण मंदिर पहुंचते हैं और वहां सलामी देकर आगे बढ़ते हैं। उल्लेखनीय है कि इतने बड़े धार्मिक आयोजन के बावजूद क्षेत्र में कभी तनाव की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई। स्थानीय समाज की आपसी समझ, संवाद और पारस्परिक सम्मान ने इस परंपरा को समय के साथ और अधिक मजबूत बनाया है। यही कारण है कि भांडेर की यह परंपरा प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए सामाजिक सौहार्द का प्रेरक उदाहरण मानी जाती है।
मंदिर का इतिहास भी सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक
चतुर्भुज नारायण मंदिर का इतिहास भी सामाजिक एकता की एक अनूठी कहानी प्रस्तुत करता है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार कई पीढ़ियों पहले कस्बे के सोंतलाई तालाब से भगवान चतुर्भुज की प्रतिमा एक स्थानीय मुस्लिम हजारी परिवार को प्राप्त हुई थी। इसके पश्चात उसी परिवार ने मंदिर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और मंदिर के रखरखाव के लिए भूमि भी दान की। यह ऐतिहासिक प्रसंग दर्शाता है कि धार्मिक आस्था और सामाजिक सहयोग किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहे, बल्कि दोनों ने मिलकर इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध बनाया। यही कारण है कि आज भी इस मंदिर को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
लोकविश्वास और परस्पर सम्मान ने परंपरा को दिया स्थायित्व
भांडेर के बुजुर्गों के अनुसार स्वतंत्रता से पहले तक यहां निकलने वाले कई धार्मिक आयोजनों में एक विशेष परंपरा निभाई जाती थी। माना जाता था कि जब तक हजारी परिवार का कोई सदस्य मंदिर परिसर में उपस्थित होकर अपनी सहमति और आशीर्वाद नहीं देता, तब तक धार्मिक कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ता था। एक अवसर पर जब परिवार में केवल एक वृद्ध महिला जीवित थीं और वे अस्वस्थ थीं, तब उन्हें विशेष रूप से पालकी में मंदिर तक लाया गया। उनके आशीर्वाद के बाद ही आयोजन आगे बढ़ाया गया। यह प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि इस क्षेत्र में धार्मिक विविधता के साथ-साथ पारस्परिक सम्मान और विश्वास को कितनी गंभीरता से निभाया जाता रहा है।
देश के लिए प्रेरणा बना सामाजिक समरसता का संदेश
वर्तमान समय में जब सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है, ऐसे उदाहरण समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करते हैं। भांडेर की यह परंपरा यह स्पष्ट करती है कि धार्मिक विविधता कभी विभाजन का कारण नहीं होती, बल्कि सम्मान और संवाद के माध्यम से वही विविधता सामाजिक शक्ति में बदल सकती है। स्थानीय प्रशासन और नागरिकों का मानना है कि ऐसी ऐतिहासिक परंपराओं का संरक्षण केवल सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का कार्य नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय समाज की समावेशी और उदार परंपराओं से परिचित कराने का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। यही कारण है कि भांडेर की यह विरासत आज राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव का प्रेरणास्रोत बन चुकी है।