भोपाल। मध्यप्रदेश में राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी के भीतर खींचतान तेज हो गई है। हालात ऐसे हैं कि प्रदेश के 31 से अधिक निगम-मंडलों, बोर्डों, आयोगों और विकास प्राधिकरणों में नियुक्तियां अटक गई हैं। इनमें कई पद ऐसे माने जाते हैं जिन्हें राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से “मलाईदार” समझा जाता है।
भोपाल विकास प्राधिकरण पर सबसे ज्यादा पेंच
भोपाल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद को लेकर कई दावेदार मैदान में हैं। पहले से चर्चा में रहा चेतन सिंह का नाम फिलहाल आगे नहीं बढ़ पा रहा है। पार्टी के कुछ मंत्री और विधायक चाहते हैं कि इस अहम पद पर उनके गुट के नेता को जिम्मेदारी मिले, ताकि भविष्य में अपने क्षेत्रों में अधोसंरचना विकास का लाभ लिया जा सके।
इंदौर विकास प्राधिकरण के लिए में दिल्ली से वीटो
विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद को लेकर भी सहमति नहीं बन सकी है। हरिनारायण यादव के नाम पर लंबे समय से चर्चा चल रही थी, लेकिन सूत्रों के अनुसार नाम लगभग तय होने से पहले ही एक सक्रिय नेता ने दिल्ली जाकर इस पर वीटो लगवा दिया। इससे नियुक्ति प्रक्रिया और उलझ गई है।
50 से ज्यादा नेता लॉबिंग में जुटे
अब तक जिन नेताओं को राजनीतिक नियुक्तियों में जगह नहीं मिल पाई है, वे बचे हुए निगम-मंडलों और प्राधिकरणों में पद पाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। पार्टी और सरकार दोनों चाहते हैं कि नियुक्तियों की प्रक्रिया आगे बढ़े, लेकिन अंदरूनी असहमति राह रोक रही है।
प्रदेश में अभी 31 पदों पर नियुक्तियां बाकी
प्रदेश में जिन प्रमुख संस्थानों में अब तक नियुक्तियां नहीं हो सकी हैं, उनमें शामिल हैं- नीति एवं योजना आयोग, सामान्य निर्धन कल्याण आयोग, पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग, गौपालन एवं पशु संवर्धन बोर्ड, खनिज विकास निगम, पंजाबी व सिंधी साहित्य अकादमी, कौशल विकास एवं रोजगार बोर्ड, पर्यटन बोर्ड, कृषि विपणन बोर्ड, महिला वित्त एवं विकास निगम, इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम, सफाई कर्मचारी आयोग, कृषक आयोग, वरिष्ठ नागरिक कल्याण आयोग, असंगठित कामगार बोर्ड, मदरसा बोर्ड, भारिया, कोल जनजाति, महाकौशल, बुंदेलखंड सहित विभिन्न विकास प्राधिकरण।
जनता पर बढ़ेगा आर्थिक बोझ
राजनीतिक नियुक्तियों का सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता दिख रहा है। अध्यक्ष-उपाध्यक्षों के लिए कार्यालय, वाहन, ड्राइवर और स्टाफ की व्यवस्था से खर्च बढ़ रहा है। एक पूर्व अध्यक्ष के अनुसार, एक पद पर औसतन 3 से 5 लाख रुपये प्रतिमाह का अतिरिक्त बोझ आता है।
कुछ चेहरों को दोबारा मौका
अब तक की नियुक्तियों में कुछ ऐसे नेता भी शामिल हैं जिन्हें पहले भी अहम पद मिल चुके हैं। तीर्थ एवं मेला प्राधिकरण के अध्यक्ष विनोद गोटिया पहले पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष रह चुके हैं। वहीं, सत्येंद्र भूषण सिंह और महेंद्र सिंह यादव जैसे नेताओं को भी दोबारा जिम्मेदारी सौंपी गई है। एमपी में राजनीतिक नियुक्तियां फिलहाल सत्ता और संगठन के बीच संतुलन साधने की कोशिशों में उलझी हैं। जब तक शीर्ष स्तर पर सहमति नहीं बनती, तब तक निगम-मंडलों और प्राधिकरणों की कुर्सियां खाली रहना तय माना जा रहा है।