मध्य प्रदेश के रीवा जिले के धुरकुच गांव में रहने वाले दीनानाथ कोल और उनकी पत्नी ननकी देवी की कहानी केवल एक दंपती की व्यक्तिगत संघर्षगाथा नहीं है, बल्कि यह मानव इच्छाशक्ति, समर्पण और प्रकृति प्रेम का असाधारण उदाहरण भी है। विवाह के वर्षों बाद भी जब उनके जीवन में संतान का सुख नहीं आया, तब उन्होंने उस पीड़ा को अपने भीतर दबाकर बैठने के बजाय समाज और प्रकृति के लिए कुछ ऐसा करने का निर्णय लिया, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन सके। जहां अधिकांश लोग ऐसी परिस्थितियों में निराशा से घिर जाते हैं, वहीं इस दंपती ने अपने जीवन का उद्देश्य बदलते हुए पेड़ों को ही अपनी संतान और जंगल को अपना परिवार मान लिया।
एक आम की गुठली से शुरू हुआ हरियाली का महाअभियान
करीब तीन दशक पहले जब दीनानाथ कोल ने रास्ते में पड़ी आम की कुछ गुठलियों को उठाकर बंजर भूमि में रोपने का निर्णय लिया, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह छोटा-सा प्रयास एक दिन विशाल वन क्षेत्र का रूप ले लेगा। वर्ष 1990 के आसपास शुरू हुई यह यात्रा अत्यंत कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ी। जिस भूमि को उन्होंने चुना वह पथरीली, सूखी और लगभग अनुपयोगी मानी जाती थी। वहां न पर्याप्त जल था और न ही किसी प्रकार की सरकारी सहायता। इसके बावजूद उन्होंने एक-एक पौधा रोपकर उसे जीवित रखने का कठिन दायित्व स्वयं उठाया और धीरे-धीरे उस वीरान भूमि में हरियाली के बीज बोने लगे।
तानों और उपेक्षा के बीच नहीं डिगा हौसला
संतान न होने के कारण दंपती को सामाजिक उपेक्षा और कटु टिप्पणियों का भी सामना करना पड़ा। कई बार लोगों के ताने और उपहास उनके मन को आहत करते थे, लेकिन उन्होंने अपनी ऊर्जा को नकारात्मकता में खर्च करने के बजाय सकारात्मक दिशा में मोड़ दिया। ननकी देवी का यह विचार कि यदि अपनी संतान नहीं है तो ऐसा कार्य किया जाए जिसे दुनिया हमेशा याद रखे, उनके जीवन का प्रेरक सूत्र बन गया। यही सोच उन्हें हर कठिनाई के बावजूद आगे बढ़ाती रही। समय के साथ लोगों की आलोचना प्रशंसा में बदल गई और वही समाज आज इस दंपती के कार्य को सम्मान की दृष्टि से देखता है।
संघर्षों से भरा रहा हरियाली का यह सफर
दीनानाथ और ननकी देवी का यह अभियान किसी सरकारी परियोजना का हिस्सा नहीं था, बल्कि पूरी तरह उनके व्यक्तिगत श्रम, समर्पण और धैर्य का परिणाम था। पौधों को पानी देने के लिए उन्होंने स्वयं कुआं खोदा, लेकिन बाद में उसे अतिक्रमण बताकर भर दिया गया। अनेक बार लगाए गए पौधे पानी की कमी और अन्य कारणों से सूख गए। आर्थिक संसाधनों का भी अभाव था, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। हर असफलता के बाद वे नए पौधे लगाते रहे और उन्हें जीवित रखने के लिए दिन-रात मेहनत करते रहे। यही निरंतरता अंततः उनकी सफलता का आधार बनी।
‘प्रेम वन’ बना पर्यावरण संरक्षण की मिसाल
आज जिस स्थान पर कभी बंजर और वीरान जमीन फैली हुई थी, वहां 105 एकड़ क्षेत्र में घना जंगल लहलहा रहा है। स्थानीय लोग इसे ‘प्रेम वन’ के नाम से जानते हैं। इस वन में आम, आंवला, अमरूद सहित अनेक फलदार और उपयोगी वृक्ष मौजूद हैं। दस हजार से अधिक पेड़ों से समृद्ध यह क्षेत्र न केवल हरियाली का प्रतीक बन चुका है, बल्कि स्थानीय जलवायु और पर्यावरण संतुलन को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे वन क्षेत्र कार्बन अवशोषण, मिट्टी संरक्षण और जैव विविधता के संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वन्यजीवों को भी मिला नया आश्रय
इस जंगल के विकसित होने के साथ-साथ यहां वन्यजीवों की आवाजाही भी बढ़ी है। मोर, हिरण, नीलगाय और कई अन्य जीव-जंतु अब इस क्षेत्र को अपना सुरक्षित निवास मानने लगे हैं। जहां पहले केवल सूखी भूमि दिखाई देती थी, वहां आज प्रकृति का जीवंत संसार विकसित हो चुका है। यह परिवर्तन केवल पेड़ों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्जीवन का उदाहरण बन गया है। इस कारण ‘प्रेम वन’ को स्थानीय स्तर पर पर्यावरणीय पुनर्स्थापन के सफल मॉडल के रूप में भी देखा जा रहा है।
पेड़ों में दिखाई देती है अपनी संतान की छवि
दीनानाथ कोल अक्सर कहते हैं कि जब ईश्वर ने उन्हें संतान का सुख नहीं दिया, तब उन्होंने इन पेड़ों को ही अपना बच्चा मान लिया। यही भावना उन्हें वर्षों तक लगातार मेहनत करने की प्रेरणा देती रही। उनके लिए हर पौधा केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य है जिसकी देखभाल उन्होंने अपने बच्चों की तरह की है। उनकी यह सोच मानव और प्रकृति के बीच गहरे संबंध का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती है। आज जब पर्यावरण संरक्षण वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है, तब यह दंपती अपने जीवन से यह संदेश देता है कि व्यक्तिगत दुःख को भी समाज और प्रकृति के हित में बदला जा सकता है।
प्रेरणा बन गई एक साधारण दंपती की असाधारण विरासत
दीनानाथ कोल और ननकी देवी की कहानी केवल रीवा या मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि बड़े परिवर्तन के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति, धैर्य और निरंतर प्रयास ही सबसे बड़ी ताकत होते हैं। उनका ‘प्रेम वन’ आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता रहेगा कि यदि मन में संकल्प हो तो बंजर जमीन ही नहीं, जीवन की कठिन परिस्थितियों को भी हरियाली में बदला जा सकता है।