कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ केवल सांकेतिक विरोध नहीं, बल्कि व्यापक जनभागीदारी वाला आंदोलन होगा। पार्टी का मानना है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम ग्रामीण भारत के लिए सुरक्षा कवच है, जिसे नए कानून से कमजोर किया जा रहा है। अभियान के तहत गांवों, ब्लॉकों और जिलों में बैठकों, सभाओं और चर्चाओं का आयोजन होगा, ताकि ग्रामीणों की आवाज़ सीधे तौर पर राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन सके।
5 जनवरी से शुरू होगा अभियान—लगातार जनसंवाद और विरोध कार्यक्रम
कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के अनुसार यह अभियान 5 जनवरी से चलेगा। इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में चार बड़ी जनसभाएँ आयोजित की जाएंगी। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि ‘विकसित भारत–जी राम जी अधिनियम’ मनरेगा के विकेन्द्रीकृत चरित्र को खत्म कर उसे केंद्र के नियंत्रण में धकेल देता है। उनका कहना है कि यह कानून ग्रामीण रोजगार की भावना के विपरीत है और इसे अदालत में चुनौती दी जाएगी।
सीडब्ल्यूसी का फैसला—संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा का सवाल
कांग्रेस कार्य समिति ने 27 दिसंबर को हुई बैठक में इस अभियान का निर्णय लिया था। पार्टी का तर्क है कि कोविड जैसे संकटों के दौरान मनरेगा ने करोड़ों ग्रामीण परिवारों को आजीविका प्रदान की। इसलिए इसे कमजोर करना सामाजिक सुरक्षा तंत्र को कमजोर करने जैसा है। कांग्रेस का आरोप है कि नया कानून मनरेगा के मूल स्वरूप को धीरे-धीरे समाप्त करने की दिशा में उठाया गया कदम है।
वित्तीय ढांचे और कार्यदिवसों पर विवाद
वेणुगोपाल ने दावा किया कि नए कानून में कार्य दिवसों को 100 से बढ़ाकर 125 दिखाया गया है, लेकिन केंद्र के वित्तीय योगदान का अनुपात 90 प्रतिशत से घटाकर 60 प्रतिशत कर देना विरोधाभासी कदम है। उनके अनुसार यह प्रावधान राज्यों पर आर्थिक बोझ बढ़ाएगा और वास्तविक रूप से रोजगार के अवसर घटा सकता है। कांग्रेस का कहना है कि यदि संसाधन ही कम कर दिए जाएं, तो कार्य दिवसों का बढ़ाना केवल घोषणा बनकर रह जाएगा।
राजनीति से आगे—ग्रामीण आजीविका और सामाजिक न्याय का प्रश्न
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह मुद्दा केवल सत्ता–विपक्ष का नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के जीवन से जुड़ा प्रश्न है। मनरेगा ने खेतिहर मजदूरों, भूमिहीन परिवारों और कमजोर तबकों को न्यूनतम सुरक्षा प्रदान की है। पार्टी का दावा है कि यदि योजना के विकेन्द्रीकृत ढाँचे को खत्म किया गया तो स्थानीय निर्णय–सत्ता भी घटेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ इसी चेतावनी और जनजागरण को केंद्र में रखकर आगे बढ़ने जा रहा है।
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