उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के बड़े हिस्से में फारस की खाड़ी के अनेक संरक्षित अरब क्षेत्रों का प्रशासन ब्रिटिश भारतीय शासन व्यवस्था के माध्यम से संचालित किया जाता था। उस समय दुबई, अबू धाबी, शारजाह और अन्य त्रूसियल शेखडम (संरक्षित अमीरात) ब्रिटिश संरक्षण में थे। इन क्षेत्रों से जुड़े अनेक प्रशासनिक, वित्तीय और कूटनीतिक मामलों का संचालन दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारतीय सरकार के माध्यम से होता था। ब्रिटिश भारतीय राजनीतिक सेवा के अधिकारी इन क्षेत्रों में नियुक्त किए जाते थे और सुरक्षा व्यवस्था में भारतीय सैनिकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। यह व्यवस्था ब्रिटिश साम्राज्य की प्रशासनिक सुविधा का हिस्सा थी, न कि इन क्षेत्रों के भारत की संप्रभु सीमा में शामिल होने का प्रमाण।
क्या वास्तव में दुबई भारत का हिस्सा बनने वाला था?
स्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश प्रशासन के भीतर इस बात पर विचार अवश्य हुआ था कि ब्रिटिश भारत के विघटन के बाद खाड़ी के संरक्षित क्षेत्रों का प्रशासनिक दायित्व किस व्यवस्था के अंतर्गत रखा जाए। इतिहासकार और लेखक सैम डैलरिम्पल ने अपनी पुस्तक Shattered Lands तथा सार्वजनिक व्याख्यानों में उल्लेख किया है कि कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने सीमित स्तर पर इस संभावना पर चर्चा की थी कि इन क्षेत्रों के प्रशासनिक संबंध स्वतंत्र भारत या नवगठित पाकिस्तान के माध्यम से जारी रखे जा सकते हैं। हालांकि उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेख यह नहीं दर्शाते कि दुबई या अन्य संरक्षित अमीरात को स्वतंत्र भारत का संवैधानिक अथवा स्थायी हिस्सा बनाने का कोई स्वीकृत या अंतिम औपचारिक निर्णय लिया गया था। इसलिए "दुबई भारत का हिस्सा बनने वाला था" कहना ऐतिहासिक तथ्यों का अत्यधिक सरलीकरण माना जाता है।
दिल्ली से चलता था प्रशासन, लेकिन संप्रभुता अलग थी
ब्रिटिश शासन के दौरान अदन से लेकर कुवैत तक अनेक संरक्षित क्षेत्रों का संचालन दिल्ली स्थित प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से किया जाता था। ब्रिटिश भारतीय राजनीतिक सेवा वहां की राजनयिक और प्रशासनिक गतिविधियों का संचालन करती थी, जबकि ब्रिटिश भारतीय सेना सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियां निभाती थी। वर्ष 1889 के इंटरप्रिटेशन एक्ट सहित कई औपनिवेशिक कानूनों में इन संरक्षित क्षेत्रों को ब्रिटिश भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के संदर्भ में देखा गया था। किंतु यह व्यवस्था ब्रिटिश साम्राज्य के प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा थी। इन क्षेत्रों की स्थानीय शासकीय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय स्थिति ब्रिटिश संरक्षण के अंतर्गत थी, इसलिए उन्हें आधुनिक अर्थों में भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं माना जा सकता।
भारतीय पासपोर्ट और गहरे सामाजिक संबंध
खाड़ी क्षेत्र और ब्रिटिश भारत के बीच संबंध केवल प्रशासन तक सीमित नहीं थे। अदन सहित कुछ क्षेत्रों में भारतीय पासपोर्ट जारी किए जाते थे और व्यापार, शिक्षा तथा रोजगार के माध्यम से भारत के साथ व्यापक सामाजिक एवं आर्थिक संपर्क विकसित हो चुके थे। अदन लंबे समय तक बंबई प्रांत के प्रशासनिक ढांचे से जुड़ा रहा। भारतीय व्यापारी, कर्मचारी, सैनिक और अधिकारी बड़ी संख्या में इन क्षेत्रों में कार्यरत थे। इसी कारण अनेक स्थानीय समुदायों का भारत से गहरा सांस्कृतिक और आर्थिक जुड़ाव विकसित हुआ। महात्मा गांधी के दौरों और उस समय के समकालीन विवरणों में भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोगों का उल्लेख मिलता है।
स्वतंत्रता के समय क्यों बदला पूरा परिदृश्य?
जब ब्रिटिश शासन भारत छोड़ने की तैयारी कर रहा था, तब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि खाड़ी के संरक्षित क्षेत्रों का भविष्य क्या होगा। ब्रिटिश अधिकारियों के बीच इस विषय पर विभिन्न स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ, लेकिन अंततः ब्रिटेन ने इन क्षेत्रों का प्रशासन भारत या पाकिस्तान को हस्तांतरित नहीं किया। बाद के वर्षों में इन अमीरातों ने क्रमशः अलग राजनीतिक विकास की दिशा अपनाई और अंततः संयुक्त अरब अमीरात सहित आधुनिक खाड़ी देशों का गठन हुआ। इतिहासकारों के अनुसार स्वतंत्र भारत की तत्कालीन प्राथमिकताएं विभाजन, शरणार्थी संकट, रियासतों के एकीकरण और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण से जुड़ी थीं। ऐसे में दूरस्थ संरक्षित क्षेत्रों के प्रशासन को जारी रखना भारत की नीति का हिस्सा नहीं बना।
इतिहास और लोकप्रिय दावों के बीच अंतर समझना आवश्यक
हाल के वर्षों में सामाजिक माध्यमों पर यह दावा व्यापक रूप से साझा किया जाता रहा है कि दुबई स्वतंत्र भारत का हिस्सा बनने वाला था। हालांकि इतिहासकारों का मत है कि इस विषय को प्रशासनिक नियंत्रण, औपनिवेशिक व्यवस्था और राजनीतिक संप्रभुता के अंतर को समझे बिना नहीं देखा जा सकता। यह सत्य है कि ब्रिटिश काल में खाड़ी के अनेक क्षेत्रों का प्रशासन दिल्ली से संचालित होता था और भारत के साथ उनके ऐतिहासिक संबंध अत्यंत गहरे थे। लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण यह स्थापित नहीं करते कि दुबई को स्वतंत्र भारत में शामिल करने का कोई अंतिम संवैधानिक निर्णय लिया गया था। इसलिए इस विषय को ऐतिहासिक संदर्भों और प्रामाणिक दस्तावेजों के आधार पर ही समझना अधिक उपयुक्त है।