अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में सब-कैटेगरी बनाने पर गुरुवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सियासत तपिश बढ़ गई है. सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच में शामिल जस्टिस बीआर गवई ने एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमीलेयर लागू करने पर भी जोर दिया. सर्वोच्च अदालत के इस फैसले ने देश में एक नए सियासी बहस को जन्म दे दिया है. बीजेपी और कांग्रेस ने भले ही चुप्पी को अख्तियार कर रखा हो, लेकिन दलित राजनीतिक चेहरे खुलकर विरोध में उतर गए हैं. बसपा की प्रमुख मायावती ही बेचैन नहीं है बल्कि बीजेपी के सहयोगी एलजेपी के अध्यक्ष केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और आरपीआई के प्रमुख रामदास अठावले भी परेशान नजर आ रहे हैं.
एससी-एसटी आरक्षण के कोटा में कोटा बनाने का फैसला आने के बाद से बसपा प्रमुख मायावती एक्टिव हैं और लगातार मोर्चा खोल रखा है. मायावती ने कहा कि आरक्षण का बंटवारा अनुचित और असंवैधानिक है. मायावती ने सुप्रीम कोर्ट से फैसले पर पुनर्विचार करने के साथ-साथ एससी और एसटी वर्ग के लोगों से अपने संवैधानिक अधिकारों को बचाने की अपील किया. केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने कहा कि रिपब्लिकन पार्टी एससी-एसटी में आरक्षण के लिए क्रीमीलेयर का कड़ा विरोध करती है, तो चिराग पासवान ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को एससी समुदाय में बंटवारा डालने वाला बताया. ऐसे में सवाल उठता है कि मायावती से लेकर चिराग पासवान और रामदास अठावले की सियासी बेचैनी क्या है?
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में सब-कैटेगरी बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कई राजनीतिक दलों का पारा चढ़ गया है और वे खुलकर फैसले का विरोध कर रहे हैं. इस विरोध के पीछे राजनीतिक दलों की अपनी सियासत छुपी हुई है.
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