जीएसटी कटौती के बाद जिन घरेलू उपयोग के उत्पादों की कीमतों में राहत मिली थी, वे अब दोबारा महंगे होने लगे हैं। बाजार से लेकर घरेलू बजट तक, हर जगह महंगाई का दबाव बढ़ रहा है। साबुन, शैम्पू, हेयर ऑयल, डिटर्जेंट, चॉकलेट, नूडल्स जैसे उत्पादों के दाम में हाल के दिनों में स्पष्ट इजाफा देखा गया है। इसकी वजह एफएमसीजी कंपनियों की ओर से इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी के चलते कीमतें 5 प्रतिशत तक बढ़ाना बताया जा रहा है।
इनपुट लागत बनी FMCG महंगाई की सबसे बड़ी वजह
कच्चे माल की कीमतों में वैश्विक स्तर पर हुई उछाल ने एफएमसीजी सेक्टर को सबसे अधिक प्रभावित किया है। पाम ऑयल, कच्चे रसायनों, प्लास्टिक पैकेजिंग और लॉजिस्टिक लागत में हुई बढ़ोतरी का सीधा असर कंपनियों की लागत पर पड़ रहा है। दूसरी ओर विनिमय दर में रुपये की कमजोरी ने आयातित कच्चे माल को और महंगा कर दिया है। यह संयुक्त दबाव कंपनियों को कीमतें बढ़ाने के लिए मजबूर कर रहा है।
प्रमुख कंपनियों ने शुरू की कीमतें बढ़ाने की प्रक्रिया
एफएमसीजी क्षेत्र की अग्रणी कंपनियां जैसे Dabur India और Hindustan Unilever ने अपने कई प्रमुख उत्पादों की कीमतें बढ़ा दी हैं। इसके अलावा सेक्टर की अन्य कंपनियां भी लागत दबाव के कारण आने वाले समय में मूल्य वृद्धि कर सकती हैं। कंपनियों का कहना है कि अभी यह बढ़ोतरी सीमित स्तर पर है, लेकिन यदि वैश्विक लागत दबाव जारी रहा, तो भविष्य में और वृद्धि से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
उपभोक्ताओं पर बढ़ रहा महंगाई का बोझ
रोजमर्रा की चीजें महंगी होने का सीधा असर आम घर-परिवार के बजट पर पड़ रहा है। घरेलू खर्च में वृद्धि और जरूरी सामानों की बढ़ती कीमतें उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता को प्रभावित कर रही हैं। विशेष रूप से उन परिवारों पर अधिक दबाव पड़ रहा है जिनकी आय में बढ़ोतरी इतनी तेज नहीं हुई जितनी रफ्तार से महंगाई आगे बढ़ रही है। कंपनियों का कहना है कि वे उत्पादन लागत और उपभोक्ता वहन क्षमता दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं।
क्या कीमतों में और हो सकती है बढ़ोतरी
विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे माल की कीमतों में स्थिरता आने तक बढ़ोतरी का जोखिम बना रहेगा। वैश्विक तेल बाजार, कृषि उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें, लॉजिस्टिक्स लागत और रुपये की विनिमय दर आने वाले महीनों में उत्पादों की कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। यदि आयात लागत और बढ़ती है, तो उपभोक्ताओं को आगे और महंगे विकल्पों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि सरकार द्वारा जीएसटी संरचना में किसी नई राहत या कच्चे माल की कीमतों में कमी आती है, तो इससे दबाव कम हो सकता है।
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