कांग्रेस पार्टी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 में किए गए संशोधनों का मकसद वन प्रबंधन के निजीकरण को बढ़ावा देना है। पार्टी महासचिव और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि इन संशोधनों के परिणाम अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं, जिससे वन संसाधनों पर निजी क्षेत्र के दखल का खतरा बढ़ गया है।
नाम बदला और दिशा भी बदल गई
अगस्त 2023 में सरकार ने इस कानून का नाम बदलकर वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम कर दिया था। रमेश के अनुसार, यह बदलाव सिर्फ नाम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे वन प्रशासन की कानूनी व्यवस्था में भी गहरा हस्तक्षेप हुआ। उन्होंने कहा कि उसी समय यह आशंका जताई गई थी कि यह प्रक्रिया निजी प्रबंधन की ओर पहला कदम बन सकती है।
मंत्रालय के परिपत्र से बढ़ी बहस
कांग्रेस नेता ने 2 जनवरी 2026 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी एक परिपत्र का हवाला देते हुए दावा किया कि यह दस्तावेज संशोधनों के वास्तविक उद्देश्य को उजागर करता है। उनके मुताबिक यह संकेत देता है कि अब निजी संस्थाओं को वन प्रबंधन में औपचारिक रूप से शामिल करने की दिशा में कार्यवाही शुरू हो चुकी है।
वन संरक्षण और समुदायों पर प्रभाव की चिंता
कांग्रेस का तर्क है कि यदि वन प्रबंधन में निजीकरण को बढ़ावा मिला तो वन संरक्षण, जैव विविधता और वनों पर निर्भर समुदायों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। पार्टी का कहना है कि वाणिज्यिक दृष्टिकोण के बजाय पर्यावरणीय सुरक्षा और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि वन केवल संसाधन नहीं बल्कि पारिस्थितिक संतुलन का आधार हैं।
वन नीति पर तेज हुई राजनीतिक जंग
वन अधिनियम संशोधनों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। जहां सरकार इन्हें विकास और बेहतर संसाधन प्रबंधन की दिशा में सकारात्मक कदम बता रही है, वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे पर्यावरण और समाज के हितों के विपरीत मान रहे हैं। यह मुद्दा आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति और नीतिगत बहस का अहम विषय बनने की पूरी संभावना रखता है।
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