नई दिल्ली | क्रोनिक हेपेटाइटिस बी से जूझ रहे मरीजों के इलाज में एक नई उम्मीद सामने आई है। अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने दवा निर्माता कंपनी GSK की दवा हिब्सागो (Hibsago), जिसे बेपिरोविरसेन (Bepirovirsen) भी कहा जाता है, को कुछ वयस्क मरीजों के इलाज के लिए मंजूरी दी है। यह दवा कुछ पात्र मरीजों को नियमित एंटीवायरल उपचार बंद करने के बाद भी वायरस पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद कर सकती है। हालांकि, इसका लाभ सभी मरीजों को मिलने की गारंटी नहीं है।
हेपेटाइटिस बी के इलाज में क्या खास है यह नई दवा?
हिब्सागो हेपेटाइटिस बी के इलाज के लिए मंजूरी पाने वाली पहली एंटीसेंस ओलिगोन्यूक्लियोटाइड दवा है। यह तकनीक वायरस से जुड़े आनुवंशिक संदेशों को निशाना बनाती है, जिससे वायरल प्रोटीन के निर्माण को कम करने में मदद मिलती है। क्रोनिक हेपेटाइटिस बी के कई मरीजों को वायरस को नियंत्रित रखने के लिए वर्षों तक एंटीवायरल दवाएं लेनी पड़ती हैं। नई दवा का उद्देश्य कुछ उपयुक्त मरीजों में उपचार के बाद भी वायरस को नियंत्रित रखने की संभावना बढ़ाना है। इसे मौजूदा एंटीवायरल उपचार के साथ दिया जाता है।
किन मरीजों को मिल सकती है हिब्सागो?
यह मंजूरी सभी हेपेटाइटिस बी मरीजों के लिए नहीं है। यह उन वयस्कों के लिए है जिनमें:
- क्रोनिक हेपेटाइटिस बी संक्रमण है, लेकिन लिवर सिरोसिस नहीं है।
- कम से कम छह महीने से एंटीवायरल उपचार चल रहा है।
- रक्त में हेपेटाइटिस बी वायरस का स्तर नियंत्रित है।
- हेपेटाइटिस बी सरफेस एंटीजन (HBsAg) का स्तर 3,000 अंतरराष्ट्रीय इकाई प्रति मिलीलीटर या उससे कम है।
मरीजों का उपचार बंद करने का निर्णय चिकित्सकीय और प्रयोगशाला जांच के नतीजों के आधार पर ही लिया जा सकता है।
क्लिनिकल ट्रायल में क्या नतीजे मिले?
दवा की प्रभावशीलता का मूल्यांकन दो क्लिनिकल परीक्षणों में किया गया। परीक्षणों में मरीजों को 24 सप्ताह तक त्वचा के नीचे हिब्सागो के इंजेक्शन दिए गए। इस दौरान उनका नियमित एंटीवायरल उपचार जारी रहा। आखिरी इंजेक्शन के बाद भी कम से कम 24 सप्ताह तक नियमित दवाएं जारी रखी गईं। दोनों परीक्षणों को मिलाकर हिब्सागो लेने वाले 24 प्रतिशत मरीज निर्धारित मानदंडों पर खरे उतरे, जिनके आधार पर उनकी नियमित एंटीवायरल दवाएं बंद करने पर विचार किया जा सकता था। प्लेसीबो समूह में कोई मरीज इन मानदंडों पर खरा नहीं उतरा। सभी हेपेटाइटिस बी उपचार बंद करने के 24 सप्ताह बाद हिब्सागो समूह के 19 प्रतिशत मरीजों में वायरस पर नियंत्रण बना रहा और उनके रक्त में HBsAg का पता नहीं चला। इसका अर्थ है कि अधिकांश मरीज इस स्तर तक नहीं पहुंचे। इसलिए इन परिणामों को सभी मरीजों के लिए स्थायी इलाज की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।
दवा के गंभीर दुष्प्रभावों को लेकर चेतावनी
नई दवा को मंजूरी मिलने के साथ इसके संभावित गंभीर जोखिमों के बारे में भी चेतावनी दी गई है। इनमें लिवर से जुड़ी गंभीर प्रतिक्रियाएं और प्लेटलेट्स की संख्या कम होना शामिल हैं। प्लेटलेट्स घटने से गंभीर और जानलेवा रक्तस्राव का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा, किडनी की कार्यक्षमता बिगड़ने, रक्त वाहिकाओं में सूजन जैसी गंभीर प्रतिक्रियाओं और इंजेक्शन देने से जुड़ी जटिलताओं का भी जोखिम बताया गया है। इंजेक्शन लगाने की जगह पर प्रतिक्रिया, बुखार, थकान और सिरदर्द इसके सामान्य दुष्प्रभावों में शामिल हैं। उपचार शुरू करने से पहले और इसके दौरान नियमित रक्त जांच तथा डॉक्टर की निगरानी जरूरी है। मरीजों को अपनी मौजूदा एंटीवायरल दवाएं स्वयं बंद नहीं करनी चाहिए।
भारत में कब उपलब्ध होगी दवा?
हिब्सागो को अमेरिकी FDA से मंजूरी मिली है। हालांकि, भारत में इसकी मंजूरी और व्यावसायिक उपलब्धता की तारीख की पुष्टि नहीं है। भारतीय मरीजों को इसके उपलब्ध होने की जानकारी के लिए संबंधित नियामक प्राधिकरण और विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
क्रोनिक हेपेटाइटिस बी क्या है?
क्रोनिक हेपेटाइटिस बी एक दीर्घकालिक वायरल संक्रमण है, जो लिवर को प्रभावित करता है। लंबे समय तक संक्रमण बने रहने से लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। मौजूदा एंटीवायरल दवाएं वायरस को दबाने में मदद करती हैं, लेकिन कई मरीजों को लंबे समय तक उपचार की जरूरत होती है। हिब्सागो की मंजूरी कुछ मरीजों के लिए उपचार के नए विकल्प की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। फिर भी, इसकी पात्रता, संभावित लाभ और जोखिम का आकलन विशेषज्ञ डॉक्टर द्वारा ही किया जाना चाहिए।